'आराधितो यदि हरिस तपसा ततः किं
नारादितो यदि हरिस तपसा ततः किं
अंतर बहिर यदि हरिस तपसा ततः किं
नांतर बहिर यदि हरिस तपसा ततः किं'
"यदि कोई भगवान हरि की आराधना कर रहा है, तो कठोर तपस्याओं का क्या उपयोग है? और यदि कोई भगवान हरि की आराधना नहीं कर रहा है, तो कठोर तपस्याओं का क्या उपयोग है? यदि कोई यह समझ लेता है कि भगवान हरि सर्वव्यापी हैं, तो कठोर तपस्याओं का क्या उपयोग है? और यदि कोई यह नहीं समझ पाता है कि भगवान हरि सर्वव्यापी हैं, तो कठोर तपस्याओं का क्या उपयोग है?" श्रीमद भागवत में (11.20.8 और 31) भगवान कृष्ण उद्धव से कहते हैं: "भौतिक जीवन से न तो अत्यधिक विरक्त रहना चाहिए और न ही उससे जुड़ा रहना चाहिए, मुझे भक्ति प्रेम के मार्ग के द्वारा ही पूर्णता प्राप्त करनी चाहिए।" और, "ज्ञान और त्याग की साधना आमतौर पर इस संसार के भीतर सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त करने का साधन नहीं है।"
