श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  1.2.70 
যেবা সব—বিরক্ত-তপস্বী-অভিমানী
তাঙ্-সবার মুখেহ নাহিক হরি-দ্বনি
येबा सब—विरक्त-तपस्वी-अभिमानी
ताङ्-सबार मुखेह नाहिक हरि-द्वनि
 
 
अनुवाद
सभी तथाकथित त्यागी और तपस्वी कभी भी हरि का नाम नहीं लेते।
 
All the so-called renunciants and ascetics never take the name of Hari.
तात्पर्य
विरक्त शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गई है: रूप, रस, गंध, ध्वनि और स्पर्श से उत्पन्न मिश्रित भाव समय-समय पर जीवों की इंद्रियों को संतुष्टि का सुख प्राप्त करने में विघ्न डालते हैं। इस तरह के भावों से अलग होने की इच्छा रखने वाले और अपने को मुक्त करने का प्रयास करने वाले को विरक्त कहते हैं। तपस्वी शब्द उस जीव के लिए प्रयुक्त होता है जो त्रिविध दुखों से पीड़ित होने के संकट से मुक्ति पाने के लिए शक्ति प्राप्त करने का प्रयास करता है। यद्यपि त्याग और तपस्या इस संसार के दुखों से मुक्ति पाने के साधन हैं, किंतु यदि वे अदोक्षज की सेवा में नहीं लगाए जाते, तो इच्छित फल देने में असफल हो जाते हैं। भगवान के नाम का जप करने वाले भक्तों के सभी प्रकार के त्याग और तपस्या गौण शाश्वत संपत्ति हैं। उन लोगों के सभी प्रयास व्यर्थ हैं जो पवित्र नामों का जप छोड़कर अलग से त्याग और तपस्या में लगे रहते हैं। त्यागियों और तपस्वियों के समुदाय भौतिक भोग की कामना रखते हैं और इस प्रकार श्री हरि के चरण कमलों की भक्ति संपदा से वंचित रह जाते हैं। ऐसे लोग अपने श्रमसाध्य अभ्यास से कोई सफलता की अपेक्षा नहीं कर सकते। महाप्रभु के आगमन से पहले, त्यागी और तपस्वी हरि की भक्ति सेवा से वंचित थे। नारद पंचरात्र में कहा गया है:

'आराधितो यदि हरिस तपसा ततः किं

नारादितो यदि हरिस तपसा ततः किं

अंतर बहिर यदि हरिस तपसा ततः किं

नांतर बहिर यदि हरिस तपसा ततः किं'

"यदि कोई भगवान हरि की आराधना कर रहा है, तो कठोर तपस्याओं का क्या उपयोग है? और यदि कोई भगवान हरि की आराधना नहीं कर रहा है, तो कठोर तपस्याओं का क्या उपयोग है? यदि कोई यह समझ लेता है कि भगवान हरि सर्वव्यापी हैं, तो कठोर तपस्याओं का क्या उपयोग है? और यदि कोई यह नहीं समझ पाता है कि भगवान हरि सर्वव्यापी हैं, तो कठोर तपस्याओं का क्या उपयोग है?" श्रीमद भागवत में (11.20.8 और 31) भगवान कृष्ण उद्धव से कहते हैं: "भौतिक जीवन से न तो अत्यधिक विरक्त रहना चाहिए और न ही उससे जुड़ा रहना चाहिए, मुझे भक्ति प्रेम के मार्ग के द्वारा ही पूर्णता प्राप्त करनी चाहिए।" और, "ज्ञान और त्याग की साधना आमतौर पर इस संसार के भीतर सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त करने का साधन नहीं है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)