श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  1.2.68 
শাস্ত্র পডাইযা সবে এই কর্ম করে
শ্রোতার সহিতে যম-পাশে ডুবি’ মরে
शास्त्र पडाइया सबे एइ कर्म करे
श्रोतार सहिते यम-पाशे डुबि’ मरे
 
 
अनुवाद
शास्त्र पढ़ाने के बाद भी, शिक्षक ऐसे ही कार्यों में लगे रहे। परिणामस्वरूप, शिक्षक और शिष्य दोनों को यमराज द्वारा दंडित किया गया।
 
Even after teaching the scriptures, the teacher continued to engage in such activities. As a result, both teacher and disciple were punished by Yamaraja.
तात्पर्य
शिक्षकों के शिक्षण कार्य तथा विद्यार्थियों के सीखने के कार्य से दोनों कर्मों का बंधन हो गया, और इन अस्थायी प्रयासों के कारण अंततः यमराज द्वारा उन्हें दंडनीय ठहराया गया। श्रीमद् भागवतम (6.3.28-29) में श्री यमराज ने अजामिल के संदर्भ में अपने नौकरों से निम्नलिखित शब्द कहे थे: "पराम्हंस महान व्यक्ति होते हैं जिन्हें भौतिक सुख में कोई रस नहीं है और भगवान्‌ के चरण कमलों के मकरंद का पान करते हैं। मेरे प्रिय नौकर, केवल उन लोगों को मेरे पास दंड के लिए लाना जो उस मकरंद के स्वाद से विमुख हैं, जो परम्हंसों के साथ नहीं मिलते हैं और जो पारिवारिक जीवन और सांसारिक सुख से मोहित हैं, जो नरक का मार्ग प्रशस्त करते हैं। मेरे प्रिय नौकर, कृपया केवल उन पापी पुरुषों को मेरे पास लाना जो कृष्ण के पवित्र नाम और गुणों का जाप करने के लिए अपनी जिह्वा का उपयोग नहीं करते हैं, जिनके हृदय कृष्ण के चरणकमलों का एक बार भी स्मरण नहीं करते और जिनके सिर कृष्ण के सम्मुख एक बार भी नतमस्तक नहीं होते। मुझे उन्हें भेजो जो विष्णु के प्रति अपना कर्तव्य नहीं निभाते, जो मानव जीवन में एकमात्र कर्तव्य हैं। कृपया ऐसे मूर्खों और बदमाशों को मेरे पास लाना।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)