श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  1.2.67 
যেবা ভট্টাচার্য, চক্রবর্তী, মিশ্র সব
তাহারাও না জানে সব গ্রন্থ-অনুভব
येबा भट्टाचार्य, चक्रवर्ती, मिश्र सब
ताहाराओ ना जाने सब ग्रन्थ-अनुभव
 
 
अनुवाद
यहाँ तक कि तथाकथित विद्वान - भट्टाचार्य, चक्रवर्ती और मिश्र - भी शास्त्रों का वास्तविक तात्पर्य नहीं जानते थे।
 
Even the so-called scholars – Bhattacharya, Chakravarti and Mishra – did not know the real meaning of the scriptures.
तात्पर्य
अनुच्छेद-अनुभव शब्द का अर्थ है "सारांश" या "काव्यार्थ"। श्रीमद भागवतम (1.2.28-29) में वर्णित है: "प्रकट शास्त्रों में ज्ञान का अंतिम उद्देश्य श्री कृष्ण, ईश्वर का व्यक्तित्व है। यज्ञ करने का उद्देश्य उन्हें प्रसन्न करना है। योग उन्हें साकार करने के लिए है। सभी फलदायी गतिविधियों को अंततः उनके द्वारा ही पुरस्कृत किया जाता है। वे सर्वोच्च ज्ञान हैं, और उन्हें जानने के लिए सभी कठोर तपस्याएँ की जाती हैं। धर्म [धर्म] उनके प्रति प्रेमपूर्ण सेवा प्रदान करना है। वे जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य हैं।" भगवद-गीता (2.45) पर अपनी टीका में, श्री माधवाचार्य निम्नलिखित श्लोकों को उद्धृत करते हैं: "रामायण, पुराणों और महाभारत सहित वैदिक साहित्य में, शुरुआत से लेकर अंत तक (आदौ) और बीच में भी (मध्ये च), केवल हरि, सर्वोच्च व्यक्तित्व, ईश्वरता को समझाया गया है, " और "सभी वैदिक ज्ञान सर्वोच्च व्यक्तित्व ईश्वर की खोज है।" (कठोपनिषद 1.2.15) "धर्म, या धार्मिक सिद्धांतों का स्रोत, वेद है, स्मृतियाँ, उनकी टीकाएँ, साधुओं का आचरण और आत्मा की संतुष्टि।" (मनु-संहिता 2.6) "वह जो वेदों में निर्धारित है वह धर्म का गठन करता है, धार्मिक सिद्धांत, और उसके विपरीत अधर्म है।" (भाग। 6.1.40) इस प्रकार वेद मुख्य रूप से विष्णु की सर्वोच्चता की घोषणा करने से संबंधित हैं। महाभारत (32-34) पर अपनी टीका में, श्री माधवाचार्य कहते हैं: "वैष्णव पुराण सभी तथ्यात्मक प्रमाण हैं, जो पंचरात्र के समान हैं। सभी मूल स्मृतियाँ भी प्रमाण हैं, सहायक हैं। इन सभी कार्यों में, केवल विष्णु की सर्वोच्चता की घोषणा की गई है, और कुछ नहीं। यह अकेला ही अंतिम विश्लेषण है। राक्षसों को चकमा देने के उद्देश्य से भगवान हरि के आदेश पर अन्य शास्त्र लिखे गए हैं। इन शास्त्रों के कथनों को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि वे असुरों के लिए हैं और अज्ञानता के अंधकार की ओर ले जाते हैं।" वेदांत-सूत्रों (1.2.26) पर अपनी टीका में श्री माधवाचार्य ने पद्म पुराण से निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया है: "जैसे पुरुष-सूक्त निरंतर विष्णु का महिमामंडन करता है, वैसे ही मेरा मन निरंतर विष्णु का महिमामंडन करता है।" भगवद-गीता पर अपनी टीका में, श्री माधवाचार्य नारदीय पुराण से इस प्रकार उद्धृत करते हैं: "यह घोषित किया गया है कि वैष्णव शास्त्रों में पंचरात्र, महाभारत, मूल रामायण, पुराण और भागवतम शामिल हैं। भगवान शिव की महिमा करने वाले पुराणों को समायोजित किया जाना चाहिए ताकि उनके कथन वैष्णव साहित्य के साथ संघर्ष न करें। वेदों का अपमान करने वाले गौतम के न्याय, कणाद के वैशेषिक, [नास्तिक] कपिल के सांख्य, पतंजलि के योग और शैव पुराणों में पाए जाने वाले दर्शनों की शरण लेते हैं।" भट्टाचार्य, जो शिक्षण में विशेषज्ञ थे, चक्रवर्ती, जो फलदायी अनुष्ठानों में विशेषज्ञ थे, और मिश्रा, जो विद्वान विद्वान थे, केवल शास्त्रीय बहस में लगे हुए थे, इसलिए वे शास्त्रों के उद्देश्य और वेदों के सार को समझने में असमर्थ थे। वे केवल निरर्थक फलदायी गतिविधियों और मानसिक अटकलों के मार्ग में लगे हुए थे। वे यह समझ नहीं पाए कि जीवित संस्थाओं की सभी गतिविधियों का एकमात्र उद्देश्य और सभी शास्त्रों का एकमात्र लक्ष्य भगवान हरि की प्रसन्नता के लिए भक्ति सेवा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)