श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.2.6 
অবিজ্ঞাত-তত্ত্ব দুই ভাই আর ভক্ত
তথাপি কৃপায তত্ত্ব করেন সুব্যক্ত
अविज्ञात-तत्त्व दुइ भाइ आर भक्त
तथापि कृपाय तत्त्व करेन सुव्यक्त
 
 
अनुवाद
यद्यपि दोनों भाइयों और उनके भक्तों के सत्य समझ से परे हैं, फिर भी उनके स्वामी की कृपा से उन्हें अनुभव किया जा सकता है।
 
Although the truths of both the brothers and their devotees are beyond understanding, they can be experienced by the grace of their master.
तात्पर्य
दोनों प्रभु, गौर और नित्य, और साथ ही साथ उनके शुद्ध भक्त भौतिक इंद्रियों की पहुंच से परे हैं और शाश्वत रूप से ज्ञान और आनंद से परिपूर्ण हैं। इसलिए घमंडी सांसारिक तार्किक जो केवल इंद्रिय संतुष्टि में रुचि रखते हैं, वे उनके वास्तविक रूपों को नहीं समझ सकते हैं। वे दयालुता से अपने अतुलनीय रूपों को केवल अपने पूरी तरह से समर्पित सेवकों को प्रकट करते हैं जिन्होंने उनकी शरण ली है। श्रील कवीराज गोस्वामी ने श्री चैतन्य-चरितामृत (आधि 1.2) में गौर-नित्य से इस प्रकार प्रार्थना की है: "मैं श्री कृष्ण चैतन्य और भगवान नित्यानंद को जो सूर्य और चंद्रमा के समान हैं, अपनी विनम्र प्रणाम अर्पित करता हूँ। वे अज्ञानता के अंधकार को दूर करने और इस प्रकार सभी पर अद्भुत रूप से आशीर्वाद प्रदान करने के लिए गौड़ के क्षितिज पर एक साथ उभरे हैं।" श्री चैतन्य-चरितामृत (आधि 1.98) में भी वे लिखते हैं: "लेकिन ये दो भाई [भगवान चैतन्य और भगवान नित्यानंद] हृदय के भीतरी कोर के अंधेरे को दूर करते हैं, और इस तरह वे दोनों प्रकार के भगवतों [भगवान के व्यक्तित्व से संबंधित व्यक्ति या चीजें] से मिलने में मदद करते हैं। "

अविज्ञात-तत्व शब्द इंगित करता है कि इन दो भाइयों का सत्य एक भौतिकवादी आनंद लेने वाली मानसिकता वाले व्यक्ति के लिए अज्ञात है। दूसरे शब्दों में, वे भौतिक ज्ञान या इंद्रिय धारणा के अधिकार क्षेत्र से परे हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)