श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.2.5 
জয জয শ্রী করুণা-সিন্ধু গৌরচন্দ্র
জয জয শ্রী সেবা-বিগ্রহ নিত্যানন্দ
जय जय श्री करुणा-सिन्धु गौरचन्द्र
जय जय श्री सेवा-विग्रह नित्यानन्द
 
 
अनुवाद
दया के सागर श्री गौरचन्द्र की जय हो! भक्ति के साक्षात् स्वरूप नित्यानंद प्रभु की जय हो!
 
Hail Lord Gourchandra, the ocean of mercy! Glory to Nityanand Prabhu, the embodiment of devotion!
तात्पर्य
हिन्दी-रूपान्तरण: श्री गौराहरी एक दया का महासागर हैं। श्री कृष्णदास कविराज ने चैतन्य-चरितामृत (आदि 8.15) में उनका वर्णन इस प्रकार किया है: "यदि आप वास्तव में तर्क और तर्क में रुचि रखते हैं, तो कृपया इसे श्री चैतन्य महाप्रभु की दया पर लागू करें। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आप इसे आश्चर्यजनक रूप से अद्भुत पाएंगे।" श्रील रूप गोस्वामी प्रभु ने भी प्रभु को नमस्कार किया है और उन्हें महान-वदान्या, सबसे उदार और कृष्ण-प्रेम-प्रद, कृष्ण के प्रेम के दाता के रूप में महिमामंडित किया है। भगवान श्री कृष्ण, माधुर्य-लीला या मधुर लीलाओं की प्रतिमा, ने अपनी गौर लीलाओं में औदार्य-लीला या उदार लीलाओं का प्रदर्शन किया है।

श्री नित्यानंद प्रभु सेवा की प्रतिमूर्ति हैं। श्री गौरसुंदर का सेवक होने के नाते, जो सर्वोच्च पूजनीय भगवान हैं, श्री नित्यानंद व्यक्तिगत रूप से गौर की पूजा करते हैं और शुद्ध भक्तों के पूजनीय भगवान हैं। हालाँकि श्री नित्यानंद राम, भगवानों के भगवान, स्वयं विष्णु हैं, वह अपने स्वयं-रूप गौर की उदार लीलाओं में सेवक और सहायक हैं। भगवान नित्यानंद अपने भगवान की दस रूपों में सेवा करते हैं। आज भी नित्यानंद की मूर्ति नबद्वीप और जगन्नाथ पुरी में देखी जाती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)