श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  1.2.49 
শোচ্য-দেশে, শোচ্য-কুলে আপন-সমান
জন্মাইযা বৈষ্ণবে, সবারে করে ত্রাণ
शोच्य-देशे, शोच्य-कुले आपन-समान
जन्माइया वैष्णवे, सबारे करे त्राण
 
 
अनुवाद
भगवान ने अपने भक्तों को, जो उनके समान हैं, अपवित्र स्थानों और अपवित्र परिवारों में प्रकट किया, ताकि वे सभी का उद्धार कर सकें।
 
The Lord manifested His devotees, who are like Him, in impure places and impure families, so that they could save everyone.
तात्पर्य
हिंदी भाषा में अनूवाद:

Śocya-kule शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गई है: धर्मपरायण लोगों पर निम्न-जन्म का प्रभाव नहीं पड़ता, क्‍योंकि उनका जन्म शुद्ध ब्राह्मण परिवारों में होता है। क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और antyajas बढ़ती हुई असावधानी से प्रभावित होते हैं। सांसारिक कर्मी अपने पाप कर्मों के कारण अधर्मी परिवारों में जन्‍म लेते हैं, लेकिन वैष्‍णव, जो भगवान विष्‍णु की सेवा में लीन रहते हैं, विष्‍णु जितने ही श्रेष्‍ठ होते हैं। वे सभी प्रकार के अधर्मी देशों और परिवारों को पवित्र कर सकते हैं। शास्‍त्रों में यह भी कहा गया है:

kulaṁ pavitraṁ jananī kṛtārthā

vasundharā vā vasatiś ca dhanyā

nṛtyanti svarge pitaro ’pi teṣāṁ

yeṣāṁ kule vaiṣṇava-nāmadheyam

"जिस भी परिवार में वैष्‍णव प्रकट होता है, उसका परिवार, माता, जन्‍मस्‍थान और निवास पवित्र हो जाता है और उसके पूर्वज स्‍वर्ग में नृत्‍य करते हैं।"

शब्द āpana-samāna यह इंगित करते हैं कि वैष्‍णव संपूर्ण विश्‍व के आध्‍यात्मिक गुरु हैं और भगवान कृष्‍ण से न केवल एकरूप हैं, बल्कि उनसे अलग भी हैं। वे भगवान विष्‍णु के चरणकमलों, सर्वोच्‍च परम सत्‍य का प्रतिनिधित्‍व करते हैं और वे ओम्‍कार ध्‍वनि को मूर्त रूप देते हैं। वैष्‍णवों के माध्‍यम से, श्री कृष्‍ण बद्ध आत्‍माओं को मुक्‍त करते हैं, जिनका हरी से विमुख होना भौतिकवादी वर्णाश्रम और जाति-चेतना को स्‍वीकार करने से उत्‍पन्‍न हुआ है। इसीलिए वैष्‍णव शास्‍त्र (हरि-भक्ति-विलास 4.366) ऊंचे स्‍वर में घोषणा करते हैं:

avaiṣṇavopadiṣṭena mantreṇa nirayaṁ vrajet

punaś ca vidhinā samyag grāhayed vaiṣṇavād guroḥ

"जो कोई गुरु से मंत्र प्राप्‍त करता है, जो भक्‍त नहीं होता या जो इंद्रिय भोग में रत होता है, वह नरक में जीवन बिताने के लिए अभिशप्‍त होता है। ऐसे व्‍यक्‍ति को तुरंत ऐसे वैष्‍णव गुरु से संपर्क करना चाहिए, जो सच्‍चा वैष्‍णव हो और फिर उन्‍हीं से मंत्र स्‍वीकार करना चाहिए।" शुद्ध वैष्‍णवों के अलावा, कोई भी सही ढंग से आचार्य का काम नहीं कर सकता। शुद्ध वैष्‍णव के अलावा कोई भी बद्ध आत्‍मा है, जो अपने कर्मों के परिणामों को भुगतता है। लेकिन वैष्‍णव विष्‍णु के पारलौकिक उपासक होते हैं और उन्होंने मायाशक्‍ति को वश में कर लिया है, इसलिए वे भगवान विष्‍णु के समान ही श्रेष्‍ठ होते हैं। वे मुक्‍त आत्‍माएं हैं, शुद्ध सत्‍वगुण में स्थित हैं, भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से परे हैं। वे भगवान विष्‍णु के शाश्‍वत सहयोगी हैं और माया की आवरण और उभारने वाली शक्‍तियों से बद्ध आत्‍माओं की साधना-भक्ति के संबंध में अपने निर्देशों के माध्‍यम से रक्षा करने में सक्षम हैं। वैष्‍णवों के अलावा लोग विष्‍णु की सेवा को अस्वीकार करते हैं और माया की सेवा करते हैं, इस प्रकार अस्‍थायी भौतिक वस्‍तुओं को नियंत्रक के रूप में स्‍वीकार करते हैं। अंततः वे अव्‍यक्‍तिवाद के सिदांध को स्‍वीकार करते हैं और नास्तिकता या धर्मविहीनता के मार्ग में गिर जाते हैं। इस तरह वे कृष्‍ण की सेवा करने की सभी प्रवृत्तियों को खो देते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)