श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  1.2.44-45 
গঙ্গা-তীর পুণ্য-স্থান-সকল থাকিতে
’বৈষ্ণব’ জন্মযে কেনে শোচ্য-দেশেতে?
আপনে হৈলা অবতীর্ণ গঙ্গা-তীরে
সঙ্গের পার্ষদে কেনে জন্মযেন দূরে?
गङ्गा-तीर पुण्य-स्थान-सकल थाकिते
’वैष्णव’ जन्मये केने शोच्य-देशेते?
आपने हैला अवतीर्ण गङ्गा-तीरे
सङ्गेर पार्षदे केने जन्मयेन दूरे?
 
 
अनुवाद
गंगा का तट परम पवित्र है। फिर कोई वैष्णव अपवित्र स्थान पर क्यों जन्म लेगा? भगवान गंगा के तट पर प्रकट हुए, तो उनके पार्षद दूर-दूर के स्थानों पर क्यों प्रकट हुए?
 
The banks of the Ganges are supremely sacred. So why would a Vaishnava be born in an impure place? If the Lord appeared on the banks of the Ganges, why did His associates appear in distant places?
तात्पर्य
श्रीमद् भागवतम (11.21.8) में शोच्या-देश अर्थात् अधर्मी स्थानों के बारे में ऐसे बताया गया है: "स्थानों में चीतल नहीं है तो वे अधर्मी हैं, जो ब्राह्मणों के प्रति निष्ठा से रहित हैं, वे अधर्मी हैं, जो चीतल हैं लेकिन सभ्य मनुष्यों से रहित हैं, किकट जैसे प्रांत और जहां स्वच्छता व शुद्धिकरण के संस्कार उपेक्षित हैं, जहाँ मांस खाने वालों की अधिकता है या जहां भूमी बांझ है, वे सभी भ्रष्ट स्थान माने जाते हैं।" मनु-संहिता (2.23) में कहा गया है: "जहां यज्ञ-संस्कार नहीं होते और जहां चीतल स्वाभाविक रूप से चरते हैं, ऐसे स्थानों को म्लेच्छ-देश अर्थात अधर्मी स्थान कहते हैं।"

गंगा, जो विष्णु के चरणों से निकलती है और जो सप्त पवित्र नदियों में श्रेष्ठ है, उसे पुराणों में सबसे अधिक शुद्ध करने की शक्ति रखने वाली के रूप में महिमामंडित किया गया है। यही कारण है कि भक्तों के बीच उसकी एक विशेष स्थिति है। गंगा, जिसे भागीरथी के नाम से भी जाना जाता है, गौड़-देश के नवद्वीप से होकर बहती है। चूंकि श्री चैतन्य के कई सहयोगी गौड़-देश के बाहर प्रकट हुए थे, इसलिए भौतिकवादी लोगों के मन में कई प्रश्न उठ सकते हैं। यदि वैष्णव ऐसे स्थान पर प्रकट होते हैं जो इतना दूषित है कि आगंतुक को प्रायश्चित की आवश्यकता होती है, एक ऐसा स्थान जो शुद्धिकरण में बाधा डालता है, तो लोग इन पवित्र वैष्णवों को भौतिक रूप से दूषित और धर्म व अधर्म के कार्यों का फल भोगने को मजबूर मानेंगे। इसलिए निम्नलिखित प्रश्न उठता है: पवित्र वैष्णवों ने गंगा के तट पर प्रकट होने के बजाय उन स्थानों पर जन्म क्यों लिया जहां पाण्डवों ने नहीं देखा था या गंगा नहीं जाती थी? यह भी प्रश्न किया जा सकता है कि श्री चैतन्यदेव स्वयं नवद्वीप के सर्वोच्च ब्राह्मण परिवार में क्यों प्रकट हुए, जो अत्यधिक पवित्र गंगा के तट पर स्थित है, फिर भी उन्होंने अपने सहयोगियों को गंगा से दूर ब्राह्मणों के अलावा अन्य परिवारों में प्रकट किया। इन सवालों के जवाब में यह कहा जा सकता है कि पवित्र वैष्णव ऐसे स्थानों और ऐसे परिवारों में उन स्थानों और परिवारों को शुद्ध करने के लिए प्रकट हुए। लेखक इसे श्लोक 46 से 52 में समझाएंगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)