गंगा, जो विष्णु के चरणों से निकलती है और जो सप्त पवित्र नदियों में श्रेष्ठ है, उसे पुराणों में सबसे अधिक शुद्ध करने की शक्ति रखने वाली के रूप में महिमामंडित किया गया है। यही कारण है कि भक्तों के बीच उसकी एक विशेष स्थिति है। गंगा, जिसे भागीरथी के नाम से भी जाना जाता है, गौड़-देश के नवद्वीप से होकर बहती है। चूंकि श्री चैतन्य के कई सहयोगी गौड़-देश के बाहर प्रकट हुए थे, इसलिए भौतिकवादी लोगों के मन में कई प्रश्न उठ सकते हैं। यदि वैष्णव ऐसे स्थान पर प्रकट होते हैं जो इतना दूषित है कि आगंतुक को प्रायश्चित की आवश्यकता होती है, एक ऐसा स्थान जो शुद्धिकरण में बाधा डालता है, तो लोग इन पवित्र वैष्णवों को भौतिक रूप से दूषित और धर्म व अधर्म के कार्यों का फल भोगने को मजबूर मानेंगे। इसलिए निम्नलिखित प्रश्न उठता है: पवित्र वैष्णवों ने गंगा के तट पर प्रकट होने के बजाय उन स्थानों पर जन्म क्यों लिया जहां पाण्डवों ने नहीं देखा था या गंगा नहीं जाती थी? यह भी प्रश्न किया जा सकता है कि श्री चैतन्यदेव स्वयं नवद्वीप के सर्वोच्च ब्राह्मण परिवार में क्यों प्रकट हुए, जो अत्यधिक पवित्र गंगा के तट पर स्थित है, फिर भी उन्होंने अपने सहयोगियों को गंगा से दूर ब्राह्मणों के अलावा अन्य परिवारों में प्रकट किया। इन सवालों के जवाब में यह कहा जा सकता है कि पवित्र वैष्णव ऐसे स्थानों और ऐसे परिवारों में उन स्थानों और परिवारों को शुद्ध करने के लिए प्रकट हुए। लेखक इसे श्लोक 46 से 52 में समझाएंगे।
