श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  1.2.36-37 
পুণ্ডরীক-বিদ্যানিধি—বৈষ্ণব-প্রধান
চৈতন্য-বল্লভ দত্ত-বাসুদেব নাম
’চাটিগ্রামে’ হৈল ইঙ্হা-সবার পরকাশ
’বুঢনে’ হৈলা অবতীর্ণ হরিদাস
पुण्डरीक-विद्यानिधि—वैष्णव-प्रधान
चैतन्य-वल्लभ दत्त-वासुदेव नाम
’चाटिग्रामे’ हैल इङ्हा-सबार परकाश
’बुढने’ हैला अवतीर्ण हरिदास
 
 
अनुवाद
पुण्डरीक विद्यानिधि, सर्वोच्च वैष्णव, चैतन्य वल्लभ और वासुदेव दत्त सभी चट्टग्राम में प्रकट हुए। हरिदास ठाकुर बुधन गाँव में प्रकट हुए।
 
Pundarika Vidyanidhi, the supreme Vaishnava, Chaitanya Vallabha and Vasudeva Datta all appeared in Chattagaram. Haridasa Thakura appeared in Budhan village.
तात्पर्य
पुंडरीका विद्यानिधी को प्रेमनिधि और आचार्यनिधि के नाम से भी जाना जाता है। श्री कवि-कर्णपूर की श्री गौर-गणोद्देस-दीपिका (54) में उनका वर्णन इस प्रकार है: "व्रज-मंडल के राजा वृषभानु अब श्री पुंडरीका विद्यानिधी के रूप में प्रकट हुए हैं।"

पुंडरीका विद्यानिधी श्री माधवेंद्र पुरीपाद के शिष्य और श्री गदाधर पंडित गोस्वामी के गुरु थे। उनकी पत्नी का नाम रत्नावती, उनके पिता का नाम बाणेश्वर (या, अन्य के अनुसार, शुक्लांबर) ब्रह्मचारी और उनकी माता का नाम गंगादेवी था। उनका पैतृक घर मेखला गाँव में स्थित है, जो चट्टग्राम से 12 मील उत्तर में हतो-हाजाड़ी पुलिस स्टेशन से दो मील पूर्व में है। चट्टग्राम से मेखला-ग्राम तक घोड़े पर, बैलगाड़ी से या स्टीमर से पहुँचा जा सकता है। स्टीमर स्टेशन को अन्नपूर्णा-घाट के नाम से जाना जाता है। पुंडरीका विद्यानिधी का जन्मस्थान अन्नपूर्णा-घाट से लगभग दो मील दक्षिण पश्चिम में है। हालाँकि विद्यानिधी के पिता ब्राह्मणों के वरेन्द्र वर्ग से थे, जब वे ढाका जिले के बाघिया गाँव में स्थानांतरित हुए, तो राढ़ा-देश के ब्राह्मण समुदाय ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। इस कारण से उनके वंशज जो शाक्त-धर्म [दुर्गा की पूजा] का पालन करते थे, समुदाय से अलग-थलग हो गए और अलग-थलग समुदाय के सदस्यों के लिए पुजारी बन गए। इस परिवार के एक सदस्य वृंदावन में रह रहे हैं और उनका नाम सरोजानंद गोस्वामी है। इस परिवार की एक विशेष विशेषता यह है कि इसके प्रत्येक सदस्य का केवल एक ही पुत्र होता था या कोई पुत्र नहीं होता था, और इसलिए परिवार बहुत विस्तृत नहीं था।

श्रीमान महाप्रभु पुंडरीका को बापा, या "पिता" कहकर संबोधित करते थे और उन्होंने उन्हें प्रेमनिधि की उपाधि दी थी यह इंगित करने के लिए कि वह सर्वोच्च भगवान के सेवक थे। मध्य-लीला, अध्याय सात में, यह वर्णित है कि पुंडरीका विद्यानidhi श्री गदाधर पंडित गोस्वामी के गुरु थे। श्री जगन्नाथदेव द्वारा पुंडरीका विद्यानिधी के गालों पर थप्पड़ मारने और इस तथ्य को अपने प्रिय मित्र श्री दामोदर स्वरूप को बताने का वर्णन अंट्य-लीला, अध्याय दस में मिलता है।

पुंडरीका विद्यानिधी का भजन-कुटीर अब बहुत पुराना और जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। मरम्मत के बिना, यह जल्द ही टूट सकता है। उस मंदिर की दीवार पर दो छंद खुदे हुए हैं, लेकिन वे इतने पुराने हैं कि उन्हें कोई पढ़ या समझ नहीं पाता। हालाँकि, इस मंदिर से लगभग दो सौ गज दक्षिण-पूर्व में एक और मंदिर है, और उस मंदिर की दीवार पर शिलालेख भी अपठनीय हैं। इस मंदिर से दस गज की दूरी पर टूटी ईंटों के ढेर से अनुमान लगाया जा सकता है कि वहाँ कभी एक और मंदिर हुआ करता था। वहाँ के वंशजों का कहना है कि मुकुंद दत्त अक्सर वहाँ अपना भजन करने आते थे। श्रीला विद्यानidhi के परिवार के दो जीवित वंशज हैं जिनका नाम श्री हरकुमार स्मृतितीर्थ और श्री कृष्णकींकर विद्यालंकार है। अधिक जानकारी के लिए वैष्णव-मंजुषा नामक शब्दकोश का उल्लेख करना चाहिए।

गदाधर पंडित की पंक्ति में चैतन्य-वल्लभ नामक एक भक्त था (देखें सी.सी. आदि 12.87)। इस पद्य में उल्लिखित चैतन्य-वल्लभ वही है या नहीं, इस पर मतभेद है, अन्यथा चैतन्य-वल्लभ शब्द का अर्थ "श्री चैतन्य को बहुत प्रिय व्यक्ति" (श्री वासुदेव दत्त ठाकुर के लिए एक विशेषण) के रूप में लिया जा सकता है।

श्री वासुदेव दत्त ठाकुर का जन्म, चट्टग्राम जिले के पतिया थाना के पास चनहारा ग्राम में हुआ था यह गाँव, श्री पुंडरीक विद्यानंद की जन्मभूमि मेखला से बीस मील की दूरी पर है। गौर-गणोदेश दीपिका (140) में कहा गया है, "व्रज में मधुकंठ और मधुव्रत नाम के दो बहुत अच्छे गायक थे। वे चैतन्य लीला में मुकुंद और वासुदेव दत्त के रूप में प्रकट हुए, जो भगवान चैतन्य महाप्रभु की संगति में गायक थे।" वे श्रीवास पंडित और श्री शिवानंद सेन के प्रिय शुभचिंतक थे। ई.आई.आर. हावड़ा-कटवा लाइन पर पूर्बस्थली नाम का एक रेलवे स्टेशन है और लगभग एक मील दूर, मामगाछी नामक एक गाँव में, जो वृंदावन दास ठाकुर की जन्मभूमि है, वासुदेव दत्त द्वारा स्थापित मदन-गोपाल का एक प्राचीन मंदिर है। वे बाद में कुमारहट्ट या कांचनपल्ली चले गए और श्रीवास और शिवानंद के साथ रहे। उनके उदार स्वभाव को देखकर, श्रीमान महाप्रभु ने शिवानंद को उनके प्रबंधक के रूप में कार्य करने और उनके अत्यधिक खर्च को कम करने का आदेश दिया (देखें सीसी मध्य 15.93-96)। भगवान हरि से विमुख दयनीय, भ्रमित जीवित संस्थाओं की ओर से श्रीमान महाप्रभु से की गयी उनकी हृदय विदारक प्रार्थनाएं चैतन्य-चरितामृत (मध्य 15.159-180) में पाई जाती हैं। चैतन्य-चरितामृत (आदि 10.41-42) में यह भी बताया गया है: "श्री चैतन्य वृक्ष की उन्नीसवीं शाखा वासुदेव दत्त एक महान व्यक्तित्व और भगवान के सबसे गोपनीय भक्त थे। कोई हजारों मुँह से भी उनके गुणों का वर्णन नहीं कर सकता था। श्रील वासुदेव दत्त ठाकुर दुनिया के सभी लोगों की पापपूर्ण गतिविधियों के लिए कष्ट उठाना चाहते थे ताकि भगवान चैतन्य महाप्रभु उन्हें उद्धार कर सकें।" उनके शिष्य श्री यदुनंदन आचार्य थे, जो श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी के दीक्षा देने वाले आध्यात्मिक गुरु थे (देखें सीसी अंतिम 6.161)। श्री मुकुंद दत्त उनके भाई थे। यह निश्चित रूप से स्पष्ट नहीं है कि श्री हरिदास ठाकुर बुधाना नामक गाँव में प्रकट हुए थे जो कि खुलना जिले में है। पहले यह गांव सातक्षीरा मंडल के भीतर चौबीस परगना जिले के भीतर था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)