श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.2.35 
ভব-রোগ-বৈদ্য শ্রী মুরারি-নাম যাঙ্র
’শ্রীহট্ট’ এ-সব বৈষ্ণবের ’অবতার’
भव-रोग-वैद्य श्री मुरारि-नाम याङ्र
’श्रीहट्ट’ ए-सब वैष्णवेर ’अवतार’
 
 
अनुवाद
वे, श्री मुरारी गुप्त के साथ, जो जीवों को उनके भौतिक रोगों से मुक्त करते हैं, सभी ने श्रीहठ में जन्म लिया।
 
They, along with Sri Murari Gupta, who liberates living entities from their material diseases, all took birth in Srihatha.
तात्पर्य
भौतिक जीवन की बीमारी को भाव-रोग शब्द से इंगित किया गया है। दूसरे शब्दों में, भाव से अभिप्राय अपने घर के प्रति आसक्ति से जन्मे भौतिक कष्टों से है। इस संबंध में श्रीमद् भागवतम (10.51.53) पर जीव गोस्वामी की लघु-तोषणी टीका का संदर्भ लेना चाहिए।

श्रील वृंदावन दास ठाकुर ने मुरारी गुप्त को वैद्य या डॉक्टर कहा है। ऐसा करके, उन्होंने संकेत दिया कि मुरारी ने अनादि काल से ईश्वर के विरुद्ध भाव रखनेवाले जीवित प्राणियों पर अज्ञान के बीज को नष्ट करके और इस प्रकार उनकी विद्रोह की बीमारी का इलाज करके बहुत करुणा दिखाई। श्री वृंदावन दास ठाकुर ने मुरारी गुप्त को कभी केवल भौतिक शरीर के डॉक्टर के रूप में संबोधित नहीं किया। व्यासदेव के अवतार और भगवान और उनके भक्तों की गतिविधियों को रिकॉर्ड करने वाले एक प्रमुख उदाहरण ने इस प्रकार पुष्टि की है कि भगवान विष्णु और वैष्णवों को एक विशेष जाति और प्रकृति के रूप में मानना पूर्णतः निषिद्ध, नारकीय और अशुभ है। वे वास्तव में दिव्य आध्यात्मिक प्राणी हैं।

वैद्य श्री मुरारी शब्द श्री मुरारी गुप्त को इंगित करते हैं, जो प्रसिद्ध पुस्तक श्री चैतन्य-चरिता के लेखक हैं। वे श्रीहट्ट में एक डॉक्टर के परिवार में प्रकट हुए और बाद में श्री नवद्वीप के निवासी बन गए। वे श्रीमान महाप्रभु से बड़े थे। उनके घर में भगवान ने वराह के रूप में अपने रूप का प्रदर्शन किया (मध्य-खंड, अध्याय 3), और भगवान के महा-प्रकाश लीलाओं के दौरान, भगवान ने उन्हें राम के रूप में अपने रूप का पता चलाया (मध्य-खंड, अध्याय 10)। एक बार श्रीवासा के घर में, जब मुरारी गुप्त ने नित्यानंद और गौरसुंदर दोनों को देखा, तो उन्होंने पहले महाप्रभु को और फिर नित्यानंद प्रभु को नमन किया। यह देखकर, महाप्रभु ने उनसे कहा, "तुमने पहले मुझे नमन करके उचित शिष्टाचार का उल्लंघन किया है।" बाद में उस रात भगवान उन्हें स्वप्न में प्रकट हुए और नित्यानंद की स्थिति की महिमा की। अगले दिन सुबह मुरारी ने पहले नित्यानंद और फिर महाप्रभु को नमन किया। इससे महाप्रभु प्रसन्न हुए, जिन्होंने फिर उन्हें अपनी चबाई हुई सुपारी के अवशेष दिए। एक दिन मुरारी ने महाप्रभु को तले हुए चावल की पेशकश की, और अगले दिन भगवान ने उस अपचनीय चावल खाने से अपच होने के अपने मनोरंजन कार्य का प्रदर्शन किया। इसलिए भगवान इलाज के लिए मुरारी गुप्त के पास आए और उनके पानी के बर्तन से पानी पीते हुए कहा, "यह एकमात्र उपाय है।" एक और दिन, जब श्रीमान महाप्रभु ने श्रीवासा के घर में चार-हाथ रूप स्वीकार किया, तो मुरारी ने गरुड़ के भाव को प्रकट किया। तब भगवान उनके कंधों पर बैठ गए और अपने शानदार मनोरंजन कार्यों का प्रदर्शन किया।

एक बार मुरारी ने विचार किया कि जब भगवान अंतर्धान हो जाएंगे, तो उनसे वियोग असहनीय होगा, इसलिए उन्होंने भगवान के अभी भी इस दुनिया में मौजूद रहने पर अपना शरीर त्यागने का फैसला किया। भगवान, जो परमात्मा हैं, ने उन्हें इस कार्य से मना किया (मध्य-खंड, अध्याय 20)। एक अन्य अवसर पर, मुरारी ने भगवान को प्रार्थनाएँ कीं जब उन्होंने मुरारी के घर में वराह का रूप धारण किया (अंत्य-खंड, अध्याय 4)। उनकी विनम्र प्रार्थनाएँ चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला, अध्याय 11, श्लोक 152 से 158 में पाई जाती हैं। भगवान रामचंद्र के प्रति उनकी आसक्ति का उल्लेख चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला, अध्याय पंद्रह, श्लोक 137 से 157 में किया गया है।

वैष्णवर 'अवतार' शब्द यह सूचित करते हैं कि वैष्णव गोलोक के निवासी हैं। उनके पास स्थूल या सूक्ष्म पदनाम नहीं है। गोलोक के ये निवासी जीवित संस्थाओं के लाभ के लिए इस भौतिक दुनिया में प्रकट होते हैं। वैष्णव राक्षसों को चकित करने और कुछ कार्यों को पूरा करने के लिए स्थूल और सूक्ष्म शरीरों को स्वीकार करते हैं; वे शरीर उनके संवैधानिक रूप नहीं हैं। यदि कर्मकांडी कार्यकर्ता बाहरी रूप से वैष्णव को निम्न-श्रेणी मानते हैं, तो यह अनुचित दृष्टि उन्हें अपराधी बनाती है। इस दुनिया में एक वैष्णव जहां भी प्रकट होता है या अवतरित होता है, उसके अष्ट सौ हजार मील के दायरे का प्रत्येक व्यक्ति सभी भौतिक अवधारणाओं से मुक्त हो जाता है। फिर वे वैष्णवों को किसी विशेष जाति में जन्मा, किसी विशेष पंथ या आश्रम से संबंधित, केवल साधारण विद्वान होने या सांसारिक भोग की वस्तुओं के रूप में विचार करने की गलतफहमियों से मुक्त हो जाते हैं। सच्चे साधु जो श्री हरि की पूजा करते हैं और देवताओं और ब्राह्मणों को उचित सम्मान देते हैं, वैष्णवों का अनादर करके कभी भी राक्षसी कर्मों के चंगुल में नहीं पड़ते हैं और इस तरह नरक की राह को साफ और चौड़ा करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)