श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  1.2.34 
শ্রীবাস-পণ্ডিত, আর শ্রীরাম-পণ্ডিত
শ্রী চন্দ্রশেখর-দেব—ত্রৈলোক্য-পূজিত
श्रीवास-पण्डित, आर श्रीराम-पण्डित
श्री चन्द्रशेखर-देव—त्रैलोक्य-पूजित
 
 
अनुवाद
श्रीवास पंडित, श्रीराम पंडित और श्री चंद्रशेखर की पूजा तीनों लोकों में की जाती है।
 
Srivasa Pandit, Sriram Pandit and Sri Chandrashekhar are worshipped in all the three worlds.
तात्पर्य
गौड़-गणोद्देस-दीपिका (90) में श्रीकवि-कर्णपूर ने श्रीवासुदेव और श्रीराम को इस प्रकार वर्णित किया है: ''परम बुद्धिमान श्रीवासु पंडित श्रीनारद मुनि से अभिन्न है। श्रीपर्वत मुनि जो नारदमुनि के अत्यंत प्रिय थे, अब श्रीराम पंडित के रुप में प्रकट हुए हैं, जो श्रीवासुदेव पंडित के छोटे भाई हैं।'' प्रभु के संन्यास ग्रहण करने के बाद श्रीवासुदेव और श्रीराम नबद्वीप छोड़कर कुमहारहाट्ट में रहने लगे। (अंत्य-खण्ड, अध्याय 5 देखें)

श्रीमान् चंद्रशेखर देव प्रभु के ममेरे भाई (शची की बहन के पति) थे। गौड़-गणोद्देस-दीपिका के अनुसार, वह नौ निधियों या चंद्रों में से एक थे। श्रीमान महाप्रभु ने बंगाल में पहली बार उनके घर में ही देवी के भाव में नृत्य और गान किया। वह स्थान जहाँ चंद्रशेखर का घर था, उसे अब व्रजपट्टन के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर विशाल अष्टकोणीय मंदिर है जो श्रीचैतन्य मठ के नाम से जाना जाता है। यह विश्व प्रसिद्ध विश्व-वैष्णव राज-सभा का पोषण केन्द्र है। इस मंदिर की चारों दिशाओं में चार वैष्णव सम्प्रदाय आचार्यों की मूर्तियाँ स्थापित हैं। इस मंदिर के मध्य में श्रीगुरु-गौरंगा और गान्धर्विका-गिरिधारी की पूजा की जाती है। नित्यानंद प्रभु ने श्रीचंद्रशेखर को प्रभु की संन्यास लेने की योजना के बारे में पहले से जानकारी दे दी थी। (मध्य-खण्ड, अध्याय 26 देखें)

जब प्रभु ने कटवा में संन्यास ग्रहण किया तब श्रीचंद्रशेखर नित्यानंद प्रभु और मुकुंद दत्त के साथ वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने संन्यास की निर्धारित विधि-विधानों को विधिवत पूरा किया और उसके बाद नबद्वीप वापस लौटकर संन्यास स्वीकार करने की बात सबको बताई। संन्यास स्वीकारने से पहले चंद्रशेखर आचार्य के घर में प्रभु के कीर्तन का वर्णन मध्य-खण्ड, अध्याय 8 में मिलता है। काज़ी को वश में करने के लिए निकलने वाले उस विशाल संकीर्तन जुलूस में चंद्रशेखर आचार्य की उपस्थिति और जब प्रभु ने श्रीधर पर अपनी दया प्रकट की तब भी वह उपस्थित थे, इसका वर्णन चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला, अध्याय 23 में मिलता है। वे बंगाल के भक्तों के साथ हर साल प्रभु से मिलने के लिए नीलाचल जाते थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)