श्रीमान् चंद्रशेखर देव प्रभु के ममेरे भाई (शची की बहन के पति) थे। गौड़-गणोद्देस-दीपिका के अनुसार, वह नौ निधियों या चंद्रों में से एक थे। श्रीमान महाप्रभु ने बंगाल में पहली बार उनके घर में ही देवी के भाव में नृत्य और गान किया। वह स्थान जहाँ चंद्रशेखर का घर था, उसे अब व्रजपट्टन के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर विशाल अष्टकोणीय मंदिर है जो श्रीचैतन्य मठ के नाम से जाना जाता है। यह विश्व प्रसिद्ध विश्व-वैष्णव राज-सभा का पोषण केन्द्र है। इस मंदिर की चारों दिशाओं में चार वैष्णव सम्प्रदाय आचार्यों की मूर्तियाँ स्थापित हैं। इस मंदिर के मध्य में श्रीगुरु-गौरंगा और गान्धर्विका-गिरिधारी की पूजा की जाती है। नित्यानंद प्रभु ने श्रीचंद्रशेखर को प्रभु की संन्यास लेने की योजना के बारे में पहले से जानकारी दे दी थी। (मध्य-खण्ड, अध्याय 26 देखें)
जब प्रभु ने कटवा में संन्यास ग्रहण किया तब श्रीचंद्रशेखर नित्यानंद प्रभु और मुकुंद दत्त के साथ वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने संन्यास की निर्धारित विधि-विधानों को विधिवत पूरा किया और उसके बाद नबद्वीप वापस लौटकर संन्यास स्वीकार करने की बात सबको बताई। संन्यास स्वीकारने से पहले चंद्रशेखर आचार्य के घर में प्रभु के कीर्तन का वर्णन मध्य-खण्ड, अध्याय 8 में मिलता है। काज़ी को वश में करने के लिए निकलने वाले उस विशाल संकीर्तन जुलूस में चंद्रशेखर आचार्य की उपस्थिति और जब प्रभु ने श्रीधर पर अपनी दया प्रकट की तब भी वह उपस्थित थे, इसका वर्णन चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला, अध्याय 23 में मिलता है। वे बंगाल के भक्तों के साथ हर साल प्रभु से मिलने के लिए नीलाचल जाते थे।
