भक्त-गोष्ठी सहित गौराङ्ग जय जय
शुनिले चैतन्य-कथा भक्ति लभ्य हय
अनुवाद
भगवान गौरांग और उनके गणों की जय हो! श्री चैतन्य महाप्रभु के उपदेशों को सुनने से मनुष्य को भगवान की भक्ति प्राप्त होती है।
All glory to Lord Gauranga and His followers! By listening to the teachings of Sri Chaitanya Mahaprabhu, one attains devotion to the Lord.
तात्पर्य
भक्त-गोष्ठी शब्द पूज्यनीय भगवान गौरासुन्दर और उनके चार मुख्य भक्तों को संदर्भित करता है, जिनका नेतृत्व श्री नित्यानंद करते हैं, जो उनके आश्रय में हैं। इन भक्तों का भगवान गौरासुन्दर की सेवा के अलावा कोई अन्य कार्य नहीं है। श्रीमान महाप्रभु के लीलाओं को सुनकर ही जीव की वास्तविक स्थिति जागृत हो जाती है। उस वास्तविक स्थिति में उसका कार्य भगवान कृष्ण की भक्ति करना है। श्री चैतन्य, उनके अवतार और उनकी महिमा के बारे में ज्ञान जीव की श्रवण इंद्रियों के लिए पोषण है। जब जीव अपनी वास्तविक गतिविधियों के प्रति जागृत हो जाता है, तो वह पूरी तरह से श्री गौर-कृष्ण की सेवा में लग जाता है। दूसरे शब्दों में, वह भगवान के साथ अपने संबंध के ज्ञान के साथ शुद्ध भक्ति सेवा करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥