सर्व - परिषद शब्द दर्शाता है कि पाँच प्रकार के कृष्ण भक्तों ने न तो विप्रलंभ के अवतार, श्री गौरसुंदर को माधुर्य - रस की वस्तु माना और न ही उनकी महान लीलाओं में उनके संयोगात्मक कार्यों में उनकी सहायता की; इसके बजाय, वे कृष्ण से उनके अलगाव की भावनाओं को पोषित करते थे, जिससे उन्हें उन भावों को विकसित करने में सहायता मिलती थी। जो लोग गौरसुंदर के हाथों में बाँसुरी या ग्वाला की लाठी रखकर, उन पर एक प्रेमी की मुद्रा थोपकर या उन्हें अर्जुन के सारथी के रूप में मानकर कृष्ण के परम आश्रय की गौर लीलाओं का खंडन करना चाहते हैं, उन्हें कभी भी गौर के साथी या सेवक नहीं माना जा सकता है। कृष्ण की मधुर लीलाओं की कई नारियों ने गौर की लीलाओं में पुरुष शरीर धारण करके गौर के लिए अपनी सेवा का प्रदर्शन किया है; इसलिए बाहरी रूप और गतिविधियाँ परम प्रभु की उनकी सेवा में अप्रासंगिक हैं।
