द्वापरीयैर् जनैर् विष्णुः पंचरात्रैस्तु केवलैः
कलौ तु नाम-मात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः
"द्वापर युग में लोगों को केवल नारद पंचरात्र और ऐसी अन्य अधिकृत पुस्तकों के नियमित सिद्धांतों द्वारा भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। हालांकि, कलियुग में, लोगों को बस भगवान के पवित्र नामों का जप करना चाहिए।''
जब भी आध्यात्मिक उन्नति की प्रक्रिया के बारे में असहमति होती है, तो प्रक्रिया की ही आम तौर पर आलोचना की जाती है। किन्तु, केवल हरि-नाम का जप ही निर्विवाद रूप से साधना की अन्य सभी प्रक्रियाओं से ऊपर स्थित है। अपने श्री शिष्टाष्टक के पहले श्लोक में, श्री चैतन्य नारायण ने कहा है:
चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणं
श्रेयः-कैरव-चन्द्रिका-वितरणं विद्या-वधू-जीवनम्
आनंदांबुधि-वर्धनं प्रति-पदं पूर्णामृतास्वादनम्
सर्वात्म-स्नापनं परं विजयते श्री-कृष्ण-संक्रीर्तनम्
"श्री कृष्ण संकीर्तन की जय हो, जो वर्षों से जमा हुई सभी धूल को हृदय से साफ करता है और जन्म-मृत्यु के चक्र की आग को बुझा देता है। यह संकीर्तन आंदोलन समग्र मानवता के लिए सर्वोत्तम वरदान है क्योंकि यह वरदान चंद्रमा की किरणों का प्रसार करता है। यह सभी पारलौकिक ज्ञान का जीवन है। यह पारलौकिक आनंद के सागर को बढ़ाता है, और हमें उस अमृत का पूरी तरह से स्वाद लेने में सक्षम बनाता है जिसके लिए हम हमेशा उत्सुक रहते हैं।'' श्री शिष्टाष्टक के दूसरे और तीसरे श्लोक में भी कृष्ण के नामों का जप करने की प्रक्रिया को समझाया गया है, चौथे श्लोक में अनर्थ-निवृत्ति की प्रक्रिया को समझाया गया है, जो हृदय को सभी अवांछित चीजों से साफ करता है, पांचवे श्लोक में जीव की संवैधानिक स्थिति को समझाया गया है, छठे श्लोक में पवित्र नाम का जप करने वाले जीव की स्थिति को समझाया गया है, सातवें श्लोक में उस अवस्था के परिणाम को समझाया गया है, और आठवें श्लोक में पूर्णता के लक्षणों को समझाया गया है। अपने भक्ति-संदर्भ (273) और श्रीमद भागवत (7.5.23-24) पर अपनी क्रम-संदर्भ व्याख्या में, श्री जीव गोस्वामी प्रभु ने पवित्र नामों के जप के संबंध में निम्नलिखित प्रक्रिया दी है जैसा कि श्री गौरासुंदर ने निर्देश दिया है: यद्यपि अन्य भक्तिः कलौ कर्तव्या, तद तत (कीर्तनाख्या-भक्ति) संयोगनेव - "हालांकि कलियुग में भक्ति सेवा की अन्य प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए, वे सभी के साथ पवित्र नामों का जप भी करना चाहिए।"
