भगवान श्री कृष्ण इस पुस्तक (श्रीमद भागवतम) में पूरी तरह से महिमामंडित होंगे, इसलिए यह पुष्टि करने के लिए कि सभी अवतार कृष्ण में शामिल हैं, उन्हें युग-अवतार के रूप में भी जाना जाता था। जब भी भगवान कृष्ण द्वापर-युग में प्रकट होते हैं, भगवान गौरसुंदर तुरंत अगले कलियुग में प्रकट होते हैं। इस कथन से यह निष्कर्ष निकलता है कि श्री गौरसुंदर स्वयं भगवान कृष्ण हैं, क्योंकि इसमें कभी कोई अपवाद नहीं हुआ है। श्री गौरसुंदर स्वयं भगवान कृष्ण हैं इस तथ्य का लेखक निम्न विशेषणों के प्रयोग से खुलासा कर रहा है।
शब्द 'कृष्ण-वर्ण' उसका उल्लेख करता है जिसके पास दो शब्दांश कृ और ष हैं। दूसरे शब्दों में, वह जिसका नाम, श्री कृष्ण चैतन्यदेव, में ये दो शब्दांश, कृ और ष (भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व) शामिल हैं। श्रीमद भागवतम (3.3.3) पर अपनी टिप्पणी में, श्रीधरस्वामी ने बताया है कि शब्दों में श्रीयः सवर्णेन, श्रीयः का अर्थ है "श्री का या रुक्मिणी का", और सवर्णेन उसका उल्लेख करता है जिसके पास दो बराबर शब्दांश रु और कमी हैं। श्रीमद भागवतम के भीतर विभिन्न स्थानों पर ऐसे दोहरे अर्थ मिलते हैं।
वैकल्पिक रूप से, शब्द 'कृष्ण-वर्ण' का अर्थ है "वह जो कृष्ण का वर्णन करता है।" दूसरे शब्दों में, वह व्यक्तिगत रूप से अपने खुद के आनंदमय आध्यात्मिक मनोरंजन को याद करते हुए पवित्र नामों का जाप करता है, और वह अपनी पवित्र नामों के बारे में सबको दयापूर्वक निर्देश देता है।
वैकल्पिक रूप से, यद्यपि वह व्यक्तिगत रूप से अ-कृष्ण, या सुनहरा है, फिर भी वह तत्विषा, या कांतिमान है। दूसरे शब्दों में, वह कृष्ण के पवित्र नामों को अपनी मधुर सुंदरता से हर किसी को वितरित करता है; या दूसरे शब्दों में, उसे देखकर हर कोई कृष्ण चेतना बन जाता है।
वैकल्पिक रूप से, यद्यपि श्री कृष्ण गौर के रूप में प्रकट होते हैं, फिर भी अपने भक्तों की दृष्टि में वह तत्विषा, या काले रंग के कांतिमान हैं। दूसरे शब्दों में, उनके भक्तों द्वारा उन्हें श्री श्यामसुंदर के रूप में देखा जाता है। इसलिए श्री गौरसुंदर स्वयं श्री कृष्ण हैं, या दूसरे शब्दों में, श्री कृष्ण व्यक्तिगत रूप से श्री गौरसुंदर के रूप में प्रकट हुए हैं। इसलिए निष्कर्ष यह है कि श्री गौरसुंदर स्वयं श्री कृष्ण हैं।
श्री गौरसुंदर की श्रेष्ठता शब्द सांगोपांगस्त्र-पार्षदम द्वारा स्थापित की गई है। दूसरे शब्दों में, भगवान अपने अंग, उपांग, अस्त्र और पार्षद - अपने अंगों, सजावट, हथियारों और सहयोगियों के साथ प्रकट होते हैं। (इस शब्द का उपयोग कर्म-धारया, एक विरोधी यौगिक में किया गया है। श्रील व्यासदेव के अनुसार भगवान के अंगों को उपांग, अस्त्र और पार्षद भी कहा जाता है।) चूँकि सर्वोच्च भगवान के अंग सबसे आकर्षक हैं, उन्हें सजावट के रूप में जाना जाता है; सर्वोच्च भगवान के अंग सबसे शक्तिशाली होने के कारण, उन्हें हथियारों के रूप में जाना जाता है; और चूँकि सर्वोच्च भगवान के अंग हमेशा भगवान के साथ रहते हैं, इसलिए उन्हें भगवान के सहयोगी कहा जाता है। कई महान व्यक्तित्वों ने भगवान के इस रूप को देखा है। यह पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और बांग्लादेश के निवासियों के बीच एक सर्वविदित तथ्य है। इस वाक्यांश का एक और अर्थ यह है कि प्रभु अपने सबसे शक्तिशाली समर्पित साथियों के साथ प्रकट हुए हैं, जैसे श्रीमद अद्वैत आचार्य, जिन्हें अंगों, उपांगों और भगवान के अस्त्रों के रूप में गिना जाता है।
भक्तगण किस पद्धति से श्री गौरासुंदर की उपासना करते हैं ? इसका उत्तर देते हुए बताया गया है कि लोग उनको यज्ञ द्वारा ही अर्चा करते हैं। इसका प्रमाण श्रीमद् भागवत (5.19.24) में देवताओं के इस कथन से है - न यत्र यज्ञेश-मखा महोत्सवाः- जहाँ सांकीर्तन-यज्ञ के सन्तोषकारी उत्सव नहीं होते। सांकीर्तन-प्रायैः विशेषण का प्रयोग इस यज्ञ को पूर्णता प्राप्त करने के साधन के रूप में स्वीकार करने की पुष्टि करता है। सांकीर्तन शब्द भगवान कृष्ण के पवित्र नामों का जाप करने वाले लोगों की एक बड़ी सभा को संदर्भित करता है। सांकीर्तन-यज्ञ की प्रक्रिया, या भगवान कृष्ण का सामूहिक महिमामंडन, जो कि भगवान के भक्तों द्वारा प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाता है, इस प्रकार पूर्णता प्राप्त करने की प्रक्रिया मानी जाती है। महाभारत (दान-धर्म 149.92, 75) के विष्णु-सहस्र-नाम में भगवान (श्री गौर) की निम्नलिखित विशेषताओं का वर्णन किया गया है: सुवर्ण-वर्णः - वह जिसका शरीर सोने के रंग का है; हेमा-अंगः - वह जिसका शरीर पिघले हुए सोने जैसा है; सुथम - वह जिसका शरीर सबसे सुंदर है; चन्दन-बलै-युक्त - वह जिसके शरीर पर चंदन का लेप किया गया था; सन्यास-लीला-अविनय-कारी - वह जो जीवन के त्यागी आदेश का पालन करता है; शम-गुण-युक्त - वह जो समतुल्य है; और शांतः - वह जो शांतिपूर्ण है। विद्वान विद्वानों में श्रेष्ठ रत्न श्री सर्वभौम भट्टाचार्य ने भी इस विषय (गौर के प्रकट होने) का वर्णन निम्नलिखित श्लोक में किया है: "मेरी चेतना, जो एक मधुमक्खी की तरह है, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के चरण कमलों की शरण लेती है, जो अभी-अभी श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए हैं ताकि स्वयं की भक्ति सेवा की प्राचीन पद्धति को सिखाया जा सके। यह प्रणाली समय के प्रभाव के कारण लगभग खो गई थी।" (जीव गोस्वामी का क्रम-संधर्भ और सर्व-सम्वादिनि)
