श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.2.24 
ইতি দ্বাপর উর্ব্-ঈশ স্তুবন্তি জগদ্-ঈশ্বরম্
নানা-তন্ত্র-বিধানেন কলাব্ অপি তথা শৃণু
इति द्वापर उर्व्-ईश स्तुवन्ति जगद्-ईश्वरम्
नाना-तन्त्र-विधानेन कलाव् अपि तथा शृणु
 
 
अनुवाद
हे राजन, इसी प्रकार द्वापर युग में लोग जगत के स्वामी की स्तुति करते थे। कलियुग में भी लोग शास्त्रों के विभिन्न नियमों का पालन करते हुए भगवान की पूजा करते हैं। अब कृपया मुझसे यह सुनिए।
 
O King, this is how people praised the Lord of the Universe in the Dvapara Yuga. Even in the Kali Yuga, people worship the Lord by following the various rules of the scriptures. Now, please listen to this from me.
तात्पर्य
यह और श्रीमद्भागवतम (11.5.31-32) का अगला श्लोक महान भक्त श्री करभाक्षण मुनी द्वारा बोला गया था, जो नौ योगेंद्रों में से एक थे। जबकि कलि युग के लिए अवतार और पूजा प्रक्रिया का वर्णन करते थे। वे विदेह के राजा निमि को उनकी प्रतिक्रिया का हिस्सा हैं, जिन्होंने भगवान हरि के अवतारों की पूजा करने के लिए रंगों, विशेषताओं, नामों, आगमन के समय और प्रक्रियाओं के बारे में पूछताछ की थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)