श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 191
 
 
श्लोक  1.2.191 
এত-দিনে গঙ্গার পূরিল মনোরথ
তুমি ক্রীডা করিবা যে চির-অভিমত
एत-दिने गङ्गार पूरिल मनोरथ
तुमि क्रीडा करिबा ये चिर-अभिमत
 
 
अनुवाद
“गंगा की चिर अभिलाषा अब पूरी होगी जब आप उसके जल में क्रीड़ा करेंगे।
 
“The long-cherished desire of Ganga will now be fulfilled when you play in its waters.
तात्पर्य
अनादि-काल से गंगा कृष्ण जी के कमल चरणों से प्रकट अमृत तथा शिरोमणि वैष्णव शिव जी के सिर पर धारण किए हुए हैं। संसार के कल्याण के लिए ​हरिद्वार से गंगासागर तक प्रवाहित हुई और तटवर्ती जीवों में सेवार्थ भाव का विस्तार किया है। मूढ़ लोग यह नहीं समझे कि वह आपके चरणाम्भोरज स्पर्श किए हुए जल हैं। अतः गंगा देवी ने इस संसार में अपने आपको आपके चरणाम्भोज स्पर्श किए जल के रूप में पहचाने जाने की सेवा-पिपासा की है। इसी से उनकी अभिलाषा की पूर्ति हो रही है कि आप अपने चरण धोकर उनके जल में स्नान करके उनका अभिषेक करें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)