श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 177
 
 
श्लोक  1.2.177 
সর্ব-লীলা-লাবণ্য-বৈদগ্ধী করি’ সঙ্গে
কৃষ্ণ-রূপে বিহর’ গোকুলে বহু-রঙ্গে
सर्व-लीला-लावण्य-वैदग्धी करि’ सङ्गे
कृष्ण-रूपे विहर’ गोकुले बहु-रङ्गे
 
 
अनुवाद
“कृष्ण के रूप में आपकी असीमित मोहक गोकुल लीलाएँ अन्य सभी अवतारों की लीलाओं को सम्मिलित करती हैं।
 
“Your infinitely enchanting pastimes in Gokul as Krishna encompass the pastimes of all other incarnations.
तात्पर्य
भगवत्पूज्य श्रीमद् भागवत (10.44.14) में उल्लेखित है: "गोपियों ने निःसंदेह कौन सी तपस्या की होगी! अपनी आँखों से वे सदैव श्रीकृष्ण के रूप के अमृत का पान करती हैं, जोकि सौन्दर्य का सार है और जिसके समकक्ष या श्रेष्ठ किसी का पाया जाना असंभव है। यह शोभा सौन्दर्य, कीर्ति और वैभव का एकमात्र निवास है। यह स्वयं सम्पूर्ण, सदैव नवीन और अति दुर्लभ है।" यह शब्द "कृष्ण-रूपे विहर' गोकुले" लघु भागवतामृत (334, 520, 538) के निम्नलिखित पद्यों में वर्णित हैं: "इस दुनिया में प्रभु द्वारा प्रदर्शित विभिन्न आश्चर्यजनक रमणीय मधुर लीलाएँ देवताओं के मध्य नारायण द्वारा प्रदर्शित वैभवपूर्ण लीलाओं से श्रेष्ठ हैं। यद्यपि भगवान कृष्ण गोकुल, मथुरा और द्वारका में अपनी लीलाएँ प्रदर्शित करते हैं, उनकी गोकुल की मधुर लीलाएँ सर्वोपरि हैं। गोपेंद्र-नंदन, श्रीकृष्ण के रूप को देखते ही सभी चेतन और अचेतन सजीव प्रसन्न हो उठते हैं, जिनका सौन्दर्य अक्षय, अमृतीय और अतुलनीय है।" ब्रह्मांड पुराण में यह कहा गया है:

सन्ति भूरिणि रूपाणि मम पूर्णानि षड् गुणैः

भवयूस्तानि तुल्यानि न मया गोप-रूपिणा

"मेरे सभी विविध रूप छह समृद्धियों से पूर्ण हैं, लेकिन मेरी ग्वाले के रूप में उपस्थिति से उनकी तुलना नहीं की जा सकती।" पद्म पुराण कहता है:

चरितं कृष्ण-देवस्य सर्वमेवाद्भुतं भवेत्

गोपाल-लीला तत्रापि सर्वतो 'ति-मनोहरा

"कृष्ण की विशेषताएँ निश्चित रूप से अद्भुत हैं, और एक ग्वाले के रूप में उनकी लीलाएँ सबसे अधिक मनमोहक हैं।" तंत्र कहते हैं:

कंदर्प-कोटि-अर्बुद-रूप-शोभा-

नीराज्यपादाब्ज-नखाँ चलस्य

कुत्राप्य दृष्ट-श्रुता-रम्य-काँतेर्

ध्यानं परं नंद-सूतस्य वक्ष्ये

"मैं नंद-सुत पर ध्यान करता हूँ, जिनका सौन्दर्य लाखों कामदेवों से भी बढ़कर है, इस प्रकार वे उनके चरण कमलों और पैर के नाखूनों की पूजा करते हैं। उनका पारलौकिक प्रकाश भौतिक इंद्रियों के वर्णन या दृष्टि से परे है।" श्रीकृष्ण की गोकुल संपर्कपूर्ण लीलाएँ सबसे पूर्ण हैं क्योंकि उनमें कृष्ण की सभी मधुर विनोदी लीलाओं के साथ ही उनके अन्य सभी अवतारों की संपर्कपूर्ण लीलाएँ भी शामिल हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)