श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.2.17 
যদা যদা হি ধর্মস্য গ্লানির্ ভবতি ভারত
অভ্যুত্থানম্ অধর্মস্য তদাত্মানṁ সৃজাম্য্ অহম্
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर् भवति भारत
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानꣳ सृजाम्य् अहम्
 
 
अनुवाद
हे भारतवंशी! जब-जब धर्म का ह्रास होता है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।
 
O descendant of Bharata, whenever there is a decline in Dharma and an increase in Adharma, I Myself incarnate.
तात्पर्य
श्रीमद भागवतम (9.24.56) का उद्धरण दिया जाना चाहिए, जिसमें श्री शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित से कहते हैं: "जब भी धर्म के सिद्धांत बिगड़ते हैं और अधर्म के सिद्धांत बढ़ते हैं, तो सर्वोच्च नियंत्रक, भगवान श्री हरि, अपनी इच्छा से प्रकट होते हैं।"

"मैं स्वयं प्रकट होता हूं" - दूसरे शब्दों में, राक्षसों को भ्रमित करने के लिए मैं इस दुनिया में एक भ्रामक ऊर्जा के पंजों में एक सृजित प्राणी की तरह खुद को प्रकट करता हूं। (विश्वनाथ चक्रवर्ती की सारार्थ-दर्शिणी)

धर्म शब्द उस धर्म को संदर्भित करता है जिसका वर्णन वेदों में किया गया है। ग्लानिः शब्द का अर्थ है "नष्ट करना"। अधर्म शब्द उस को संदर्भित करता है जो धर्म के विपरीत है। अभ्युत्थान शब्द का अर्थ है "उठना"। "मैं प्रकट होता हूं" शब्दों का मतलब भौतिक वस्तु की तरह बनाया गया नहीं है, क्योंकि मैं सृष्टि से पहले भी व्यक्तिगत रूप से मौजूद था। इसलिए सृजित वस्तुओं का मुझ पर कोई अधिकार नहीं है। (बालदेव विद्याभूषण की गीता-भूषण टीका)

श्रीमद भागवतम (7.15.12-14) में महर्षि नारद ने महाराज युधिष्ठिर को अधर्म शब्द इस प्रकार समझाया है: "अधर्म की पाँच शाखाएँ हैं, जिन्हें उचित रूप से अधर्म [विधर्म], धार्मिक सिद्धांत जिसके लिए कोई अयोग्य होता है [पर-धर्म], दिखावटी धर्म [आभास], सादृश्यपूर्ण धर्म [उपधर्म] और धोखाधड़ी वाला धर्म [छल-धर्म] के रूप में जाना जाता है। जो व्यक्ति वास्तविक धार्मिक जीवन के बारे में जानता है, उसे इन पाँचों को अधार्मिक के रूप में त्याग देना चाहिए। धार्मिक सिद्धांत जो किसी को अपने धर्म का पालन करने से रोकते हैं, वह विधर्म कहलाते हैं। दूसरों द्वारा प्रस्तुत किए गए धार्मिक सिद्धांतों को पर-धर्म कहा जाता है। एक व्यक्ति द्वारा बनाए गए एक नए प्रकार के धर्म जिसे बनाने वाला व्यक्ति झूठा घमंडी होता है और जो वेदों के सिद्धांतों का विरोध करता है, उसे उपधर्म कहा जाता है। और किसी की शब्दों की बाजीगरी द्वारा व्याख्या को छल-धर्म कहा जाता है। एक दिखावटी धार्मिक प्रणाली जो किसी के द्वारा अपने जीवन के आदेश के निर्धारित कर्तव्यों की जानबूझकर उपेक्षा करने से निर्मित होती है, उसे आभास [एक मंद प्रतिबिंब या झूठी समानता] कहा जाता है। लेकिन अगर कोई अपने विशेष आश्रम या वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्यों का पालन करता है, तो वे सभी भौतिक संकटों को दूर करने के लिए पर्याप्त क्यों नहीं होते हैं?

मेरी उपस्थिति को नियंत्रित करने वाला एकमात्र आदेश यह है कि मैं स्वतंत्र हूं, इसलिए मैं जब चाहूं प्रकट होता हूं। जब भी धार्मिक सिद्धांतों में गिरावट होती है और अधर्म का प्रसार प्रमुख होता है, तो उस समय मैं अपनी खुद की मधुर इच्छा से उतरता हूं। पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करने वाले नियम अनादि हैं। लेकिन जब समय के साथ ये नियम किसी अनिर्धारित कारण से दोषपूर्ण हो जाते हैं, तो अधार्मिकता प्रमुख हो जाती है। मेरे अलावा कोई भी इस स्थिति का मुकाबला करने में सक्षम नहीं है। इसलिए मैं अधार्मिक सिद्धांतों को नष्ट करने के लिए अपनी आंतरिक शक्तियों के साथ इस भौतिक दुनिया में प्रकट होता हूं। ऐसा नहीं है कि मैं केवल भारतवर्ष की भूमि में प्रकट होता हूं, बल्कि जरूरत के हिसाब से देवताओं और निम्न प्रजातियों के बीच भी प्रकट होता हूं। इसलिए यह मत सोचो कि मैं म्लेच्छ और अन्य नीच मनुष्यों के बीच प्रकट नहीं होता। मैं उनके और उनके द्वारा पालन किए जाने वाले धार्मिक सिद्धांतों की रक्षा के लिए उनके बीच शक्त्यवेश-अवतार या सशक्त अवतार के रूप में भी प्रकट होता हूं। फिर भी मैं भारत में अपने आश्रितों के बीच प्रकट होने के लिए अधिक उत्सुक हूं, क्योंकि वहाँ वर्णाश्रम-धर्म बिना किसी बाधा के पालन किया जाता है। इसलिए सभी मनभावन युग-अवतार और अंश-अवतार केवल भारतवर्ष की भूमि में ही पाए जाते हैं। निष्काम-कर्म-योग, दार्शनिक अटकल (ज्ञान-योग) और भक्ति-योग की अंतिम प्रक्रिया बिना किसी फल-इच्छा के किए गए कार्य ठीक से नहीं किए जाते हैं जहाँ वर्णाश्रम-धर्म का अभ्यास नहीं होता है। लेकिन यह निश्चित रूप से जान लें कि नीच मनुष्यों के बीच भक्ति के निशान भक्तों की दया के कारण हैं। (श्रील भक्तिविनोद की विद्वद-रंजन टीका)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)