श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 164
 
 
श्लोक  1.2.164 
স্রুক্-স্রুব-হস্তে যজ্ঞ, আপনে করিযা
সবারে লওযাও যজ্ঞ, যাজ্ঞিক হৈযা
स्रुक्-स्रुव-हस्ते यज्ञ, आपने करिया
सबारे लओयाओ यज्ञ, याज्ञिक हैया
 
 
अनुवाद
“आप अपने हाथों में बलि का कलछी और चम्मच लेकर चलते हैं और सभी को बलि देने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
 
“You walk around with the sacrificial ladle and spoon in your hands and encourage everyone to offer the sacrifice.
तात्पर्य
**श्रुक:** श्रुक शब्द विंकांकात (बैंचा) वृक्ष की लकड़ी से बने एक करछुल को संदर्भित करता है जिसका उपयोग यज्ञ की अग्नि को घी चढ़ाने के लिए किया जाता है। यह किसी की बांह की लंबाई का होता है, और एक सिरे पर इसका हैंडल होता है और दूसरे सिरे पर हंस के मुख आकार का एक कटोरा होता है।

**श्रुवा:** श्रुव शब्द खैर की लकड़ी से बने एक चम्मच को संदर्भित करता है। इसका एक सिरा अंगूठे की नोक की तरह गोलाकार होता है, और दूसरे सिरे पर दो अर्ध-वृत्ताकार इंडेंटेशन होते हैं। यह हवन के लिए आवश्यक पूजा सामग्री का एक हिस्सा है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)