श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  1.2.157 
তথাপিহ দশরথ-বসুদেব-ঘরে
অবতীর্ণ হৈযা বধিলা তা-সবারে
तथापिह दशरथ-वसुदेव-घरे
अवतीर्ण हैया वधिला ता-सबारे
 
 
अनुवाद
फिर भी, वे दशरथ और वसुदेव को मारने के लिए उनके घर में प्रकट हुए।
 
Nevertheless, he appeared in the house of Dasharatha and Vasudeva to kill them.
तात्पर्य
भगवान को गर्भ में ही प्रार्थना अर्पित करते हुए, देवताओं ने भी प्रार्थना की, "हे चंद्रमा के समान व्यक्तित्व। आप शची के सागर जैसे गर्भ में प्रकट हुए, फिर भी आप असंख्य ब्रह्मांडों की शरण हैं।"

भगवान पूरी तरह से स्वतंत्र हैं और पूरे ब्रह्मांड को नष्ट करने में सक्षम हैं, इसलिए केवल उनकी इच्छा से कंस और रावण जैसे राक्षस जो भगवान विष्णु के विरोधी हैं उन्हें एक इशारे से मारा जा सकता है। फिर भी, अपने लीलाओं के हिस्से के रूप में, वह दशरथ के घर में प्रकट हुए और रावण को मार डाला, और वह वासुदेव के घर में प्रकट हुए और कंस को मार डाला।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)