श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 134
 
 
श्लोक  1.2.134 
যে প্রভু পতিত-জনে নিস্তার করিতে
অবধূত-বেশ ধরি’ ভ্রমিলা জগতে
ये प्रभु पतित-जने निस्तार करिते
अवधूत-वेश धरि’ भ्रमिला जगते
 
 
अनुवाद
पतित आत्माओं का उद्धार करने के लिए नित्यानंद प्रभु ने भिक्षुक का वेश धारण किया और पूरे विश्व की यात्रा की।
 
To save fallen souls, Nityananda Prabhu disguised himself as a mendicant and traveled the entire world.
तात्पर्य
पतित जीवों को उद्धार करने के लिए, श्री नित्यानंद प्रभु ने परमहंस अवधूत का वेष धारण किया और एक साधु की तरह घूमे।

अवधूत-वेश का अर्थ किसी भौतिकवादी की तरह कपड़े पहनने की अपेक्षा जैसा कि सांसारिक बुद्धि के नियंत्रण में होता है, एक संन्यासी की तरह दिखना होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)