पतित जीवों को उद्धार करने के लिए, श्री नित्यानंद प्रभु ने परमहंस अवधूत का वेष धारण किया और एक साधु की तरह घूमे।अवधूत-वेश का अर्थ किसी भौतिकवादी की तरह कपड़े पहनने की अपेक्षा जैसा कि सांसारिक बुद्धि के नियंत्रण में होता है, एक संन्यासी की तरह दिखना होता है।