श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  1.2.102 
সবে করে সবারে বান্ধব-ব্যবহার
কেহ কারো না জানেন নিজ-অবতার
सबे करे सबारे बान्धव-व्यवहार
केह कारो ना जानेन निज-अवतार
 
 
अनुवाद
उन सभी के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध थे, यद्यपि वे एक-दूसरे की पहचान से अनभिज्ञ थे।
 
There was a friendly relationship between all of them, although they were unaware of each other's identity.
तात्पर्य
भगवान की सेवा में साधु-संतों के साथ उनके सगे-संबंधी और मित्र भी सहयोग करते थे। साधु-संतों के वे सगे-संबंधी और मित्र अपने स्वादानुसार साधु-संतों से मित्रता करने के कारण स्वयं को भूल जाते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)