"जैसे-जैसे सभी मेरी शरण में आते हैं, मैं उन्हें वैसा ही फल देता हूँ। हे पृथापुत्र, सभी लोग सभी प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण करते हैं।"
"As everyone surrenders to Me, I reward them accordingly. O son of Pritha, all people follow My path in all respects."
तात्पर्य
“श्रीकृष्ण अर्जुन को श्रोता बनाकर यहाँ विरोधियों की दलीलों का खंडन कर रहे हैं, जो कह सकते हैं, 'क्या भेदभाव करने की प्रवृत्ति तुममें भी नहीं है? तुम भक्ति सेवा केवल उन्हें देते हो जो तुम्हें समर्पण करते हैं, लेकिन क्या तुम इच्छावादी व्यक्ति को देते हो?' 'पर मैं इसका उत्तर इसके पहले वाला श्लोक में दे रहा हूँ। यथा शब्द उन लोगों को इंगित करता है जो मुझे इच्छाओं के साथ या बिना इच्छाओं के पूजते हैं, जिन्हें मैं केवल उसी के अनुसार पुरस्कृत करता हूँ (मैं उन्हें उनकी पूजा के अनुसार फल देता हूँ), दूसरे शब्दों में, मैं उन पर कृपा करता हूँ, लेकिन मैं उन महत्वाकांक्षी व्यक्तियों की भी उपेक्षा नहीं करता जो मुझे अस्वीकार करते हैं (कर्म के फलों का आनंद लेने की इच्छा के साथ) और इंद्र के नेतृत्व में विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं। इस पर विचार किया जाना चाहिए। कारण यह है कि इंद्र जैसे विभिन्न देवताओं के सेवक अप्रत्यक्ष रूप से मेरे उपासना के मार्ग का अनुसरण करते हैं क्योंकि इंद्र की पूजा के माध्यम से भी मेरी ही पूजा की जाती है। ” (श्रीधर स्वामी की सुबोधिनी कमेंटरी)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥