यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यंजकम्।
यदन्यत्रापि दृश्यते तत्तेनैव विनिर्दिशेत्॥
“जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र होने के लक्षणों का जैसा वर्णन किया गया है, वह दूसरे वर्ग में प्रकट होने पर भी उन्हीं लक्षणों से कहे जाएँ।” इस निषेध का उल्लंघन करने वाले जो सर्व ब्राह्मणों के गुरु वैष्णवों को शूद्र मानते हैं या जो अ-वैष्णवों को ब्राह्मण मानते हैं या जो वैष्णवों के गुणों को भूलवश शूद्रों के गुण मान लेते हैं, उनके नित्य कल्याण के लिए भगवान् ने भक्त ब्राह्मण के चरण-प्रक्षालन के जल को पीने का चरित्र दिखाया। केवल अच्युत के भक्त ब्राह्मण ही भगवान् अच्युत की सेवा कर सकते हैं, क्योंकि अज्ञानमय अविद्या से आच्छादित पापी शूद्रों की सर्वदा अज्ञान की प्रधानता होने से उपवीत नहीं रहता और इसलिए वे भगवान् की सेवा से विमुख रहते हैं। अपने शरीर को आत्मा न मानने वाले और मानसिक कल्पना में प्रवृत्त न होने वाले ही ब्रह्म को जानने वाले ब्राह्मण होते हैं। सीमित कालिक भोग्य भौतिक पदार्थों में उनकी बुद्धि नहीं उलझती। चूँकि उनकी चेतना पूर्णतया आध्यात्मिक है, इसलिए उन्हें भौतिक भावनाओं का त्याग कर भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को समझते हुए कृष्ण-भावना का आचरण करना चाहिए। कृपणों को ब्राह्मण नहीं कहते। धर्म-शास्त्रकार अत्रि मुनि ने कहा है -
ब्रह्म-तत्त्वं न जानति ब्रह्मसूत्रेण गर्वितः।
तनेव स च पापेन विप्रः पशु उदाहृतः॥
“ब्राह्मणत्व के सूत्रों पर गर्व करने वाले परमार्थतत्व को न जानने वाले पापी व्यक्ति को विप्र होने पर भी पशु कहा जाता है।” इसलिए असली, मूर्ख, भ्रमित जीव ऐसे पशु-विप्र के चरण-प्रक्षालन का जल पीते ही तुरंत पशु हो जाते हैं।
