श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 17: भगवान की गया यात्रा  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.17.20 
তবে প্রভু ব্যবস্থিলা ঔষধ আপনে
’সর্ব-দুঃখ খণ্ডে বিপ্র-পাদোদক-পানে’
तबे प्रभु व्यवस्थिला औषध आपने
’सर्व-दुःख खण्डे विप्र-पादोदक-पाने’
 
 
अनुवाद
तब भगवान ने अपनी औषधि बताई, "यदि मैं ब्राह्मण के पैरों को धोकर बनाया गया जल पी लूं, तो मेरा कष्ट दूर हो जाएगा।"
 
Then the Lord told his medicine, "If I drink the water prepared by washing the feet of a Brahmin, my pain will go away."
तात्पर्य
जब भगवान् के बुखार पर अनेक औषधियों का प्रभाव न पड़ा, तब लोगों को विष्णु के विज्ञान से सम्भूत ब्राह्मणों की सर्वोच्च स्थिति का उपदेश देने के लिए जगद्गुरु भगवान् ने स्वेच्छा से एक ब्राह्मण के चरण धोने वाले जल को औषधि के रूप में लेने का आचरण दिखाया। इस क्रिया द्वारा भगवान् ने एक ओर कर्म-फल में फँसे और यमराज के दण्ड के पात्र जीवमात्र के लिए माया का खेल दिखाया, दूसरी ओर विष्णु के विज्ञान को जानने वाले सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा की रक्षा की। जैसे नारायण के चरित्र में भगवान् ने भृगु के पैर के चिन्ह को अपने वक्षः स्थल पर धारण करके अपने भक्तों की महिमा बढ़ाई थी, वैसे ही गौर के चरित्र में भगवान् ने अपनी सम्बद्ध देह की प्रतिष्ठा स्थापित की। भगवान् के इस अद्भुत गोपनीय चरित्र को न समझकर ही मूर्ख प्राकृत-सहजिया संप्रदाय के लोग बहुधा जाति-गोत्र के अभिमान में आवृत होकर असुर ब्राह्मणों के चरण-प्रक्षालन के सामान्य जल को पी जाते हैं। श्रीमद्भागवतम् (7.11.35) में लिखा है -

यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यंजकम्।

यदन्यत्रापि दृश्यते तत्तेनैव विनिर्दिशेत्॥

“जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र होने के लक्षणों का जैसा वर्णन किया गया है, वह दूसरे वर्ग में प्रकट होने पर भी उन्हीं लक्षणों से कहे जाएँ।” इस निषेध का उल्लंघन करने वाले जो सर्व ब्राह्मणों के गुरु वैष्णवों को शूद्र मानते हैं या जो अ-वैष्णवों को ब्राह्मण मानते हैं या जो वैष्णवों के गुणों को भूलवश शूद्रों के गुण मान लेते हैं, उनके नित्य कल्याण के लिए भगवान् ने भक्त ब्राह्मण के चरण-प्रक्षालन के जल को पीने का चरित्र दिखाया। केवल अच्युत के भक्त ब्राह्मण ही भगवान् अच्युत की सेवा कर सकते हैं, क्योंकि अज्ञानमय अविद्या से आच्छादित पापी शूद्रों की सर्वदा अज्ञान की प्रधानता होने से उपवीत नहीं रहता और इसलिए वे भगवान् की सेवा से विमुख रहते हैं। अपने शरीर को आत्मा न मानने वाले और मानसिक कल्पना में प्रवृत्त न होने वाले ही ब्रह्म को जानने वाले ब्राह्मण होते हैं। सीमित कालिक भोग्य भौतिक पदार्थों में उनकी बुद्धि नहीं उलझती। चूँकि उनकी चेतना पूर्णतया आध्यात्मिक है, इसलिए उन्हें भौतिक भावनाओं का त्याग कर भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को समझते हुए कृष्ण-भावना का आचरण करना चाहिए। कृपणों को ब्राह्मण नहीं कहते। धर्म-शास्त्रकार अत्रि मुनि ने कहा है -

ब्रह्म-तत्त्वं न जानति ब्रह्मसूत्रेण गर्वितः।

तनेव स च पापेन विप्रः पशु उदाहृतः॥

“ब्राह्मणत्व के सूत्रों पर गर्व करने वाले परमार्थतत्व को न जानने वाले पापी व्यक्ति को विप्र होने पर भी पशु कहा जाता है।” इसलिए असली, मूर्ख, भ्रमित जीव ऐसे पशु-विप्र के चरण-प्रक्षालन का जल पीते ही तुरंत पशु हो जाते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)