श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 17: भगवान की गया यात्रा  »  श्लोक 154-158
 
 
श्लोक  1.17.154-158 
কেহ বলে,—“প্রভু-নিত্যানন্দ-বলরাম”
কেহ বলে,—“চৈতন্যের মহা-প্রিয-ধাম”
কেহ বলে,—“মহা-তেজীযান্ অধিকারী”
কেহ বলে,—“কোন-রূপ বুঝিতে না পারি”
কিবা যতি নিত্যানন্দ, কিবা ভক্ত, জ্ঞানী
যার যেন-মত ইচ্ছা না বোলযে কেনি
যে-সে কেনে চৈতন্যের নিত্যানন্দ নহে
সে চরণ-ধন মোর রহুক হৃদযে
এত পরিহারে ও যে পাপী নিন্দা করে
তবে লাথি মারোঙ্ তার শিরের উপরে
केह बले,—“प्रभु-नित्यानन्द-बलराम”
केह बले,—“चैतन्येर महा-प्रिय-धाम”
केह बले,—“महा-तेजीयान् अधिकारी”
केह बले,—“कोन-रूप बुझिते ना पारि”
किबा यति नित्यानन्द, किबा भक्त, ज्ञानी
यार येन-मत इच्छा ना बोलये केनि
ये-से केने चैतन्येर नित्यानन्द नहे
से चरण-धन मोर रहुक हृदये
एत परिहारे ओ ये पापी निन्दा करे
तबे लाथि मारोङ् तार शिरेर उपरे
 
 
अनुवाद
कोई कहता है, "नित्यानंद प्रभु बलराम हैं," और कोई कहता है, "वे भगवान चैतन्य के परम प्रिय भक्त हैं।" कोई और कहता है, "वे एक शक्तिशाली व्यक्तित्व हैं," और कोई कहता है, "हम समझ नहीं पाते कि वे कौन हैं।" कोई नित्यानंद को संन्यासी मान सकता है, कोई उन्हें भक्त मान सकता है, और कोई उन्हें ज्ञानी मान सकता है। वे जो चाहें कह सकते हैं। भले ही नित्यानंद भगवान चैतन्य के एक अत्यंत तुच्छ सेवक हों, फिर भी मैं उनके चरणकमलों को अपने हृदय में रखूँगा। इसलिए मैं ऐसे किसी भी पापी व्यक्ति के सिर पर लात मारता हूँ जो भगवान नित्यानंद की महिमा का अनादर करता है और उनकी आलोचना करने का साहस करता है।
 
Some say, "Nityananda is Lord Balarama," and some say, "He is Lord Chaitanya's most beloved devotee." Someone else says, "He is a powerful personality," and still others say, "We cannot understand who he is." One may consider Nityananda a sannyasi, another may consider him a devotee, and another may consider him a jnani. They can say whatever they want. Even if Nityananda is a very lowly servant of Lord Chaitanya, I will still keep his lotus feet in my heart. Therefore, I kick the head of any sinful person who disrespects the glories of Lord Nityananda and dares to criticize him.
तात्पर्य
"लोगों की राय में, नित्यानंद प्रभु ही बलराम हैं, जो कृष्ण और परमेश्वर के साक्षात स्वरूप है। औरों की राय में, वह परमेश्वर के सेवक व्यक्तित्व हैं, जो चैतन्यदेव के परम प्रिय सेवक हैं। ऐसे भी कई अन्य हैं जो उन्हें महाभागवत, अवधूत, परमहंस मानते हैं। और कुछ ऐसे भी लोग हैं जो यह नहीं समझ पाते कि वह कौन हैं। नित्यानंद स्वरूप संन्यासियों के परमहंस अवधूत आध्यात्मिक गुरु हो सकते हैं, या फिर वह ऐसे भक्त हो सकते हैं जिन्होंने ईश्वर के विज्ञान को समझा है; हो सकता है लोग उन्हें जैसे चाहें उसे संबोधित करते हों, या हो सकता है उनका चैतन्यदेव से किसी भी तरह का रिश्ता हो, लेकिन मैं नित्यानंद के अमूल्य चरणों को हमेशा अपने हृदय में रखूंगा। यदि कोई नास्तिक यह मानता है कि अंध-तामिस्र या महा-रौरव नामक नरकों में कष्ट उठाना सबसे स्वादिष्ट है, और वह उसे हासिल करने के लिए मेरे आध्यात्मिक गुरु की निंदा करता है, तो मैं उनकी सांसारिक प्रतिष्ठित स्थिति या उच्च पद की परवाह किए बिना उसके सिर पर लात मारूँगा, जो सभी पापी प्रवृत्तियों का भंडार है। कौरवों की शरारत देखकर और उनकी निंदापूर्ण बातें सुनकर, श्रीमद् भागवतम (10.68.31) में श्री बलदेव ने निम्नलिखित शब्द कहे: 'यह साफ तौर पर उन बदमाशों के कई जुनून हैं जिन्होंने उन्हें इतना घमंडी बना दिया है कि उन्हें शांति नहीं चाहिए। फिर उन्हें शारीरिक दंड से शांत किया जाए, जैसे कि जानवरों को छड़ी से किया जाता है।'"

यदि कोई सच्चा शिष्य अपने वास्तविक पूर्णत: भक्तिपूर्ण आध्यात्मिक गुरु के कमल-चरणों में ऐसी निष्ठा के गुण की कमी रखता है, तो उसे सच्चा "शिष्य" नहीं कहा जा सकता है। इस तथ्य को समझे बिना, पापी, नारकीय लोग उसकी सेवा करने के बजाय आध्यात्मिक गुरु की निंदा करके अशुभता को आमंत्रित करते हैं। ठाकुर वृंदावन ने एक सच्चे शिष्य के उचित शिष्टाचार को उज्ज्वल स्वर्ण शब्दों में दर्ज करने के लिए इस दुनिया में जिन महान लाभकारी विषयों का प्रकटीकरण किया, उसके परिणामस्वरूप, संपूर्ण दुनिया के शुद्ध वैष्णवों ने ठाकुर वृंदावन को संपूर्ण वैष्णव समुदाय के गुरुदेव के रूप में स्वीकार किया है। जिन लोगों को इस वैदिक निष्कर्ष में घृणित धोखाधड़ी प्रवृत्तियों या पापपूर्ण उद्देश्यों से जन्म लिया गया मामूली संदेह है, उनके लिए गौरा-कृष्ण के प्रति भक्ति प्राप्त करने के लिए जीवन के बाद जीवन की कोई संभावना नहीं है। नित्यानंद प्रभु की दया प्राप्त करते हुए और उनके कर्तव्यों का उत्तराधिकार प्राप्त करते हुए, ठाकुर वृंदावन ने इस दुनिया में आचार्य-गुरु के रूप में कार्य किया है। अज्ञानी, गदहा जैसे, छद्म भक्त जो धूर्त विनम्रता के नारकीय सजीव अवतार प्राकृत-सहजीयों को आदर्श आध्यात्मिक गुरु मानते हैं, वे केवल ठाकुर वृंदावन के कमल-चरणों में अपराध करते हैं। चैतन्य और नित्यानंद के आश्रय के तहत कोई भी शुद्ध भक्त कभी भी ठाकुर वृंदावन का विरोध करने वाले पापी अप-सम्प्रदायों के साथ किसी भी तरह से संबंध नहीं बनाएगा। फिर भी यदि पिछले दुष्कर्मों या दुर्भाग्य के कारण किसी का सामना ऐसे बुरे संग से होता है, तो गौड़ीय वैष्णवों के पास उस बेईमान व्यक्ति के साथ जुड़ने की कोई योग्यता नहीं है, जिसका कुत्सित मन वृंदावन दास ठाकुर के कमल-चरणों से भटक गया है। अभिमानी व्यक्तियों के समुदाय को वृंदावन दास ठाकुर की निस्वार्थ दया को समझने के लिए लाखों जन्म लगेंगे, इसलिए जब तक उनके अपराध समाप्त नहीं हो जाते हैं, उन्हें कभी भी शुद्ध वैष्णव के पवित्र सर्व-शुभ चरणों से सिर पर लात खाने का अवसर नहीं मिलेगा। शुद्ध वैष्णव की ईमानदार दया प्राप्त करने की वास्तविक इच्छा भी अज्ञानी सांसारिक पापी लोगों, धर्मप्रिय साधना करने वालों, या मानसिक विचारकों के लिए एक दुर्लभ वस्तु है। हरि, गुरु और वैष्णव के प्रति विमुख रहने वाले जीवों ने अपने पिछले जन्मों में पर्याप्त धर्म नहीं अर्जित किया है, न ही उनके हजारों पूर्वजों ने पर्याप्त धर्म अर्जित किया है, कि वे ठाकुर वृंदावन के पवित्र, पारलौकिक, परम-लाभ-प्रदान करने वाले कमल-चरणों से शुभ लात प्राप्त करने के लिए योग्य हैं। जिस क्षण शुद्ध वैष्णव के कमल-चरणों की धूल पापी व्यक्तियों के सिर पर गिरेगी, उसी क्षण वे सभी भौतिक संदूषण और छल से मुक्त हो जाएंगे और इस प्रकार भक्ति सेवा के धन के स्वामी बन जाएंगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)