| श्री चैतन्य भागवत » खण्ड 1: आदि-खण्ड » अध्याय 17: भगवान की गया यात्रा » श्लोक 127 |
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| | | | श्लोक 1.17.127  | কাহারে না বলি’ প্রভু কত-রাত্রি-শেষে
মথুরাকে চলিলেন প্রেমের আবেশে | काहारे ना बलि’ प्रभु कत-रात्रि-शेषे
मथुराके चलिलेन प्रेमेर आवेशे | | | | | | अनुवाद | | एक दिन प्रातःकाल, बिना किसी को बताए, भगवान् प्रेम में मग्न होकर मथुरा के लिए प्रस्थान कर गए। | | | | One morning, without telling anyone, the Lord, immersed in love, left for Mathura. | | ✨ ai-generated | | |
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