श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 17: भगवान की गया यात्रा  »  श्लोक 126
 
 
श्लोक  1.17.126 
ভক্তি-রসে মগ্ন হৈ’ বৈকুণ্ঠের পতি
চিত্তে স্বাস্থ্য না পাযেন, রহিবেন কতি
भक्ति-रसे मग्न है’ वैकुण्ठेर पति
चित्ते स्वास्थ्य ना पायेन, रहिबेन कति
 
 
अनुवाद
परन्तु वैकुण्ठ के स्वामी तो भक्ति में लीन थे और उनका हृदय व्याकुल था, अतः वे कैसे शांत रह सकते थे?
 
But the Lord of Vaikuntha was absorbed in devotion and his heart was troubled, so how could he remain calm?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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