श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 17: भगवान की गया यात्रा  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  1.17.113 
আত্ম-প্রকাশের আসি’ হৈল সময
দিনে-দিনে বাডে প্রেম-ভক্তির বিজয
आत्म-प्रकाशेर आसि’ हैल समय
दिने-दिने बाडे प्रेम-भक्तिर विजय
 
 
अनुवाद
जैसे-जैसे भगवान के प्रकट होने का समय आया, उनकी प्रेममयी भक्ति भावनाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती गईं।
 
As the time for the Lord's appearance approached, his loving devotional feelings increased day by day.
तात्पर्य
आदर्श भक्त की भूमिका निभाते हुए सर्वोच्च भगवान गौरासुंदर ने तत्पश्चात एक आत्म-साक्षात्कारित, समर्पित जीव के आंतरिक भावों को प्रदर्शित करने का चरित्र निभाया। क्रमिक रूप से प्रभु के हृदय में एक प्रियतम के भाव में दास्य-प्रेम-भक्ति, सख्य-प्रेम-भक्ति, वात्सल्य-प्रेम-भक्ति और माधुर्य-प्रेम-भक्ति निरंतर नवीन भावों में वृद्धि हुई। वात्सल्य-प्रेम-भक्ति माधुर्य-प्रेम-भक्ति में शामिल है, सख्य-प्रेम-भक्ति वात्सल्य-प्रेम-भक्ति में शामिल है, दास्य-प्रेम-भक्ति सख्य-प्रेम-भक्ति में शामिल है और तटस्थ शांत-भक्ति दास्य-प्रेम-भक्ति में शामिल है। शर्तित आत्मा का शाश्वत संवैधानिक रूप पहले मन के रूप में एक सूक्ष्म शरीर द्वारा ढका जाता है, और फिर बाहरी दुनिया में भटकने के लिए यह एक स्थूल शरीर द्वारा कवर किया जाता है। इन दो अस्थायी भौतिक निकायों के भीतर, शाश्वत आत्मा विराजमान है। जैसे ही निष्क्रिय आत्मा को पुनर्जीवित किया जाता है, शर्तित अवस्था का भौतिक शरीर और मन तुरंत नियंत्रण में आ जाता है। अन्यथा, जब ये दो भौतिक पदनाम प्रमुख होते हैं और आत्मा अपनी शर्तित अवस्था से नहीं जागी है, तो उसकी सेवा करने की प्रवृत्ति का कोई लक्षण नहीं है जो कि सर्वोच्च भगवान के लिए उसकी शाश्वत पूर्ण संवैधानिक कर्तव्य है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)