श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 16: श्री हरिदास ठाकुर की महिमा  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  1.16.94 
খণ্ড খণ্ড হৈ দেহ যায যদি প্রাণ
তবু আমি বদনে না ছাডি হরি-নাম
खण्ड खण्ड है देह याय यदि प्राण
तबु आमि वदने ना छाडि हरि-नाम
 
 
अनुवाद
“भले ही मेरा शरीर टुकड़ों में काट दिया जाए और मैं अपनी जान दे दूं, मैं भगवान के पवित्र नाम का जाप कभी नहीं छोड़ूंगा।”
 
“Even if my body is cut into pieces and I give up my life, I will never give up chanting the holy name of the Lord.”
तात्पर्य
"ये मातृ-पितृ-प्राप्त स्थूल तन नित्य नहीं है, कृष्ण की सेवा से विमुख होकर जो भौतिक सुखों में लिप्त है, वह जीवन भी नश्वर है, बदलने वाला है। परंतु परमेश्वर के पवित्र नाम और स्वयं परमेश्वर दो पृथक् वस्तु नहीं हैं। आध्यात्मिक नाम काल के कारक में मनुष्य द्वारा आविष्कृत भौतिक वस्तुओं के नामों से भिन्न होते हैं। आध्यात्मिक नाम और नाम का धारक एक है। अतः मैं कभी भी पवित्र नामों का जाप करना नहीं छोड़ सकता और अपने स्थूल व सूक्ष्म शरीरों में विश्वास नहीं कर सकता। जीव की मूलभूत स्थिति यह है कि वह कृष्ण का नित्य दास है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक जीव वैष्णव है। वैष्णवों के पास श्रीहरि के पवित्र नामों का जाप करने के अलावा कोई भी अन्य कार्य नहीं है। साधक और सिद्ध जीव दोनों का एकमात्र कर्तव्य है प्रभु के पवित्र नामों का जाप करना। मैं इसे छोड़कर मानव निर्मित सामाजिक व्यवहार का पालन नहीं कर सकता। भले ही इसका परिणाम यह हो कि समाज और उसके प्रशासक मुझे जितना चाहें यातना दें, मैं यह सब मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ सहन करने को तैयार हूँ। मैं अस्थायी भौतिक सुख के पीछे भागने के लिए कभी भी हरि की शाश्वत सेवा का त्याग नहीं करूँगा। शिष्य परंपरा के माध्यम से प्राप्त कृष्ण के आध्यात्मिक नामों का कीर्तन करने के अलावा मेरा और कोई कार्य नहीं है। शरीर और मन दोनों ही शरीर के स्वामी ‘मैं’ से भिन्न हैं, क्योंकि ‘मैं’ नित्य हूँ, जबकि शरीर और मन अस्थायी हैं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)