श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 16: श्री हरिदास ठाकुर की महिमा  »  श्लोक 262
 
 
श्लोक  1.16.262 
প্রতি-দিন উচ্চারণ করিযা কি কায?”
এই-রূপে বলে যত মধ্যস্থ-সমাজ
प्रति-दिन उच्चारण करिया कि काय?”
एइ-रूपे बले यत मध्यस्थ-समाज
 
 
अनुवाद
“प्रतिदिन भगवान का नाम जपने की क्या आवश्यकता है?” इस प्रकार नास्तिकों ने भक्तों की अनेक प्रकार से निंदा की।
 
"What is the need to chant the name of God every day?" Thus the atheists criticized the devotees in many ways.
तात्पर्य
उदासीन होने का बहाना करके कुछ कामना वाले कर्मी कहते थे, “प्रभु के नामों का रट्टा लगाने में कोई लाभ नहीं है। क्योंकि सारे प्राणी अपने कर्मों के फल में बँधे हुये हैं, और परम प्रभु भी कर्मों के अधीनस्थ हैं। इसलिए कर्मों के फलों को भोगने के लिए विवश प्राणी प्रभु-नाम लेने से केवल अपने पित्त को ही बढ़ाते हैं।” इस तरह मध्य-वर्गीय लोग जो न तो भक्त थे और न अ-भक्त, ऐसी दलीलें और व्यर्थ की बातें किया करते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)