श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 16: श्री हरिदास ठाकुर की महिमा  »  श्लोक 243
 
 
श्लोक  1.16.243 
স্পর্শের কি দায, দেখিলেই হরিদাস
ছিণ্ডে’ সর্ব-জীবের অনাদি কর্ম-পাশ
स्पर्शेर कि दाय, देखिलेइ हरिदास
छिण्डे’ सर्व-जीवेर अनादि कर्म-पाश
 
 
अनुवाद
“उनके स्पर्श की तो बात ही क्या, हरिदास के दर्शन मात्र से ही मनुष्य सकाम कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
 
“Forget about his touch, just by seeing Haridas, a person becomes free from the bondage of selfish actions.
तात्पर्य
हरिदास के छूने की तो बात ही क्या, अगर कोई मात्र दर्शन कर ले, तो भी उसके अनादि काल से हुए अज्ञान के कारण की सारी भौतिक बंधन एक साथ कट जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)