श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 15: श्री विष्णुप्रिया के साथ विवाह  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.15.8 
ইতো-মধ্যে কদাচিত্ কেহ কোন দিনে
কপালে তিলক না করিযা থাকে ভ্রমে
इतो-मध्ये कदाचित् केह कोन दिने
कपाले तिलक ना करिया थाके भ्रमे
 
 
अनुवाद
इस दौरान कभी-कभी संयोगवश कोई विद्यार्थी अपने माथे पर तिलक लगाना भूल जाता था।
 
During this time, sometimes by chance a student would forget to apply tilak on his forehead.
तात्पर्य
तिलक शब्द का तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो वैष्णव के रूप में दीक्षित होता है और कमर के ऊपर अपने बारह अंगों-माथे, पेट, सीने, गले, दाईं कमर, दाहिने हाथ, दाहिने कंधे, बाईं कमर, बांए हाथ, बांए कंधे, ऊपरी पीठ और निचली पीठ को हरि के मंदिर के रूप में चिह्नित करता है या ऊर्ध्व पुंड्र (दो लंबवत रेखाएं) होता है। माथा इन बारह स्थानों में से एक है। नारद पुराण में कहा गया है: "एक वैष्णव जो अपना माथा ऊर्ध्व पुंड्र से चिह्नित करता है, वह तुरंत पूरे विश्व को शुद्ध करता है।" विष्णु के भक्त हमेशा ऊर्ध्व पुंड्र या तिलक लगाते हैं, और शिव के भक्त, जो विष्णु के प्रति भक्तिपूर्ण सेवा के विरोधी हैं, त्रिपुंड्र, या तीन रेखाएं लगाते हैं। शास्त्रीय आदेश यह है कि एक राजा को दो बार जन्म लेने वाले दीक्षित को जो तिलक नहीं करता है, उसे पीछे की ओर गधे पर बिठाकर शहर से बाहर निकाल देना चाहिए। इसलिए प्रत्येक दीक्षित वैष्णव को हमेशा तिलक धारण करना चाहिए। यही कारण है कि भगवान जो जगत-गुरु हैं, सभी के शिक्षक हैं, उन्होंने अपने बचपन के अतीत में ऐसे निर्देश दिए। यदि कोई भगवान विष्णु की पूजा करना चाहता है, तो उसे दीक्षा से संबंधित पांच संस्कारों को स्वीकार करना चाहिए। आम तौर पर दो बार जन्म लेने वाला व्यक्ति दस प्रकार के संस्कार करता है। जो लोग दो बार जन्म लेने वाले से कम हैं, वे वैष्णव बनने के लिए पंद्रह प्रकार के संस्कार करते हैं। जिस प्रकार एक ब्राह्मण को एक शुद्ध ब्राह्मण धागा बनाए रखने के लिए बाध्य किया जाता है, उसी प्रकार एक दीक्षित वैष्णव को शिखा, ब्राह्मण धागा, तिलक और माला बनाए रखने के लिए बाध्य किया जाता है। तिलक लगाने के तरीके के विवरण के लिए, हरि-भक्ति-विलास (4.66-98) का उल्लेख करना चाहिए। पद्म पुराण, उत्तर-खंड में कहा गया है: "एक साधक को केशव जैसे भगवान के नामों का जाप करते हुए अपने शरीर को बारह निशानों से सजाना चाहिए।" शरीर के बारह भागों को तिलक के बारह चिह्नों से सजाने की प्रक्रिया इस प्रकार है:

ललाटे केशवं ध्यान नारायणमथोदरे

वक्षः-स्थले माधवं तु गोविंदं कण्ठ-कूपके

विष्णुं च दक्षिणे कुक्षौ बाहौ च मधुसूदनम्

त्रिविक्रमं कंधरे तु वामनं वाम-पार्श्वके

श्रीधरं वाम-बाहौ तु हृषीकेशं तु कंधरे

पृष्ठे च पद्मनाभं च कट्यां दामोदरं न्यसेत्

तत् प्रक्षालण-तोयन तु वासुदेवाय मूर्धनि

ऊर्ध्व-पुंड्रं ललाटे तु सर्वेषां प्रथमं स्मृतम्

ललाटा दि क्रमेणैव धारणं तु विधीयते

"जब कोई माथे पर तिलक लगाता है, तो उसे केशव को याद रखना चाहिए। जब कोई निचले पेट पर तिलक लगाता है, तो उसे नारायण को याद रखना चाहिए। छाती के लिए, माधव को याद रखना चाहिए, और गर्दन के खोखले स्थान पर निशान लगाते समय उसे गोविंद को याद रखना चाहिए। पेट के दाहिने हिस्से पर निशान लगाते समय भगवान विष्णु को याद किया जाना चाहिए, और दाहिने हाथ पर निशान लगाते समय मधुसूदन को याद रखा जाना चाहिए। दाहिने कंधे पर निशान लगाते समय त्रिविक्रम को याद किया जाना चाहिए और पेट के बाईं तरफ निशान लगाते समय वामन को याद किया जाना चाहिए। बाएं हाथ पर निशान लगाते समय श्रीधर को याद किया जाना चाहिए, और बाएं कंधे पर निशान लगाते समय हृषीकेश को याद किया जाना चाहिए। पीठ पर निशान लगाते समय पद्मनाभ और दामोदर को याद किया जाना चाहिए। फिर हाथ को सिर पर पोंछते हुए पानी से धोना चाहिए और वासुदेव को याद करना चाहिए। माथे पर पहले तिलक लगाना चाहिए। यह नियम है। उसके बाद उपरोक्त प्रक्रिया के अनुसार तिलक लगाना चाहिए।" भगवान ने पद्म पुराण में कहा है: "मेरे भक्त हमेशा तिलक लगाते हैं, जो सभी प्रकार के भय को नष्ट कर देता है।"

यदि कोई व्यक्ति अपने शरीर को तिलक से नहीं सजाता है, तो उसे पाप लगेगा। पद्म पुराण में नारद मुनि ने कहा है: "यदि कोई व्यक्ति तिलक लगाए बिना यज्ञ करता है, दान देता है, तपस्या करता है, वेद पढ़ता है, या पितरों को तर्पण देता है, तो ये सभी गतिविधियां निरर्थक होंगी। यदि कोई व्यक्ति अपने शरीर को तिलक से नहीं सजाता है, तो उसे नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि उसका शरीर श्मशान की तरह अपवित्र होता है।" आदित्य पुराण में उल्लेख किया गया है: "एक राजा को एक ऐसे गिरे हुए ब्राह्मण को, जिसके शरीर पर तिलक, शंख और चक्र के वैष्णव चिह्न न हों, गधे की पीठ पर बैठाकर अपने राज्य से बाहर निकाल देना चाहिए।" पद्म पुराण, उत्तर-खंड में कहा गया है: "वह व्यक्ति जो तिलक लगाए बिना पूजा-पाठ जैसी कोई भी गतिविधि करता है, उसे कोई लाभ नहीं मिलता है। इसमें कोई संदेह नहीं है। निश्चित रूप से जान लें कि जो व्यक्ति बिना तिलक लगाए संध्या करता है, वह केवल आसुरी होता है और निश्चित रूप से नरक जाता है।" टेढ़े या तीन रेखाओं वाले तिलक लगाने पर प्रतिबंध: पद्म पुराण, उत्तर-खंड में कहा गया है: "वह व्यक्ति जो वैष्णव तिलक के बजाय तीन रेखाओं वाला तिलक लगाता है, वह मनुष्यों में सबसे नीच होता है। शरीर पर तिलक लगाने के नियमों को तोड़ने के कारण, जो भगवान विष्णु का निवास है, ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से नरक जाता है।" स्कंद पुराण में कहा गया है: "किसी व्यक्ति को टेढ़ा तिलक नहीं लगाना चाहिए, भले ही वह मरने वाला हो, और न ही उसे नारायण के पवित्र नामों के अलावा किसी अन्य नाम का जाप करना चाहिए। उसे वैष्णव तिलक लगाना चाहिए, यदि उपलब्ध हो तो गोपी-चंदन का उपयोग करके।" अन्यत्र कहा गया है: "विद्वान व्यक्तियों को पता है कि ब्राह्मणों और भक्तों के लिए वैष्णव तिलक लगाने के लिए नियम हैं और अन्य लोगों को तीन रेखाओं वाले तिलक लगाने चाहिए। यदि कोई ब्राह्मण को देखता है या छूता है, जिसने वैष्णव तिलक के बजाय तीन रेखाओं वाला तिलक लगाया है, तो उसे अपने कपड़ों के साथ स्नान करना चाहिए। एक वैष्णव को वैष्णव तिलक के बजाय तीन रेखाओं वाला तिलक नहीं लगाना चाहिए क्योंकि ऐसा कार्य भगवान हरि को प्रसन्न नहीं करता है।" स्कंद पुराण में कार्तिक महीने के बारे में कथनों में कहा गया है: "उस व्यक्ति को नहीं देखना चाहिए जिसके माथे पर वैष्णव तिलक नहीं लगा हो। यदि कोई ऐसा करता है, तो उसे तुरंत सूर्य को देखना चाहिए, क्योंकि भगवान हरि और लक्ष्मीदेवी तिलक के भीतर निवास करते हैं।" पद्म पुराण, उत्तर-खंड में कहा गया है: "बरगद की पत्ती, बांस की पत्ती और कमल की कली के समान तिलक के निशान सबसे मनमोहक होते हैं।" शरीर को तिलक से सजाने की महिमाएँ इस प्रकार हैं: "तिलक के निशान के भीतर का सुंदर खाली स्थान श्री लक्ष्मी और भगवानों के भगवान श्री जनार्दन के बैठने का स्थान है। इसलिए निश्चित रूप से जान लें कि तिलक से चिह्नित शरीर भगवान का एक पवित्र मंदिर है।" ब्रह्मांड पुराण में उल्लेख किया गया है: "यदि कोई व्यक्ति जो अपवित्र, दुर्व्यवहार करने वाला और अपने मन से पापी गतिविधियों में लिप्त है, अपने शरीर को तिलक से सजाता है, तो वह निश्चित रूप से हमेशा के लिए शुद्ध हो जाता है। किसी को अपने चेहरे को दर्पण या पानी में देखते हुए अपने माथे पर तिलक लगाना चाहिए, लेकिन कभी भी अपने नाखूनों से तिलक को न छूना चाहिए।"

तिलक लगाने के नियम एवं विधान :- पद्म पुराण, उत्तरखंड में कहा गया है कि ''श्री हरि के अत्यंत सौभाग्यशाली अनन्य प्रेमी अपने शरीर में तिलक ऐसे लगावें, जिसके बीच में खाली जगह रहे और जो श्री हरि के चरण कमलों के समान हो। वे अपनी नाक के सिरे से प्रारंभ कर माथे के अंत तक तिलक को लगाना आरंभ करें। नाक का सिरा, नाक के तीन चौथाई नीचे का भाग होता है। भौंहों के मध्य से ऊपर की ओर दो अलग-अलग रेखाएँ खींचनी चाहिए।'' तिलक के चिन्ह में स्थान रखने का विधान :- "जो पतित द्विज तिलक के चिह्न में स्थान न रखकर तिलक धारण करता है, वह निश्चित रूप से श्री हरि तथा लक्ष्मी देवी का त्याग कर देता है, जो उसी स्थान पर विराजित रहते हैं। इसमें संदेह नहीं कि जो पतित द्विज स्थान न रखकर तिलक धारण करता है, वह अपने माथे पर कुत्ते के पैर रखता है। अतः हे सुमुखी, ब्राह्मण और स्त्रियाँ अपने माथे पर सदा दो डंडों जैसा तिलक धारण करना चाहिए, जिसमें बीच में स्थान हो।'' तिलक को हरि के मंदिर के रूप में पहचान :- "जिस तिलक के चिह्न में रेखाओं के बीच में सुंदर स्थान हो वह नाक से आरंभ होकर सिर के ऊपर के केश तक जाता है, उसे हरि का मंदिर कहते हैं। बाएँ भाग में भगवान ब्रह्मा, दाहिने भाग में सदाशिव तथा इस तरह के तिलक के चिन्ह के मध्य भाग में भगवान विष्णु विराजते हैं। मध्य में कुछ भी नहीं लगाना चाहिए।'' तिलक बनाने की मिट्टी का वर्णन पद्म पुराण में इस प्रकार किया गया है। :- ''तिलक की मिट्टी उस बहते जल के नीचे से लेनी चाहिए, जिस जल से भगवान विष्णु का स्नान हो गया हो। अथवा हरि के परमधाम से मिट्टी लेनी चाहिए। वैकुंठ पर्वत, श्री रंगम, श्री कूर्म क्षेत्र, श्री द्वारका, श्री प्रयाग, श्री नृसिंह क्षेत्र, श्री वराह क्षेत्र तथा श्री वृंदावन [या किसी भी तुलसी वन] से भक्तिभाव से मिट्टी लेनी चाहिए और फिर उस मिट्टी को विष्णु के चरण कमलों को धोने वाले जल से मिलाना चाहिए। इस प्रकार के तिलक से अपने शरीर को विभूषित कर भगवान के सम्मुख उपस्थित होना चाहिए। हे महाराजा अंबरीष, देखिए, जिसके ललाट पर गोपी चंदन से निर्मित तिलक लगा है, वह पाप कर्मों को न्यूनतम करता है।'' स्कंद पुराण में ध्रुव महाराज कहते हैं। :- ''यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जिसके माथे पर शंख व चक्र का तिलक है, जिसके सिर पर तुलसी मंजरी है तथा जिसके अंग गोपी चंदन से लिपटे हुए हैं, तो आपको पाप कर्मों से क्यों डरना चाहिए? किसी वैष्णव को अपने ललाट पर तुलसी पौधे की मूल से ली गई मिट्टी से बना आकर्षक तिलक लगाना चाहिए। अपने माथे पर गोपी चंदन का तिलक लगाना चाहिए और भगवान को अर्पित की हुई माला पहननी चाहिए। इस प्रकार मनुष्य को अपने माथे पर तीन प्रकार के तिलक में से किसी एक से तिलक लगाना चाहिए। भगवान हरि को प्रसन्न करने के लिए मनुष्य अपने शरीर को मत्स्य व कूर्म के विभिन्न रूपों तथा चक्र जैसे विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से भी विभूषित करना चाहिए।'' तिलक लगाने का वैदिक विधान :- यजुर्वेद की हिरण्यकेशी शाखा में कहा गया है। :- ''जो व्यक्ति हरि के चरण कमलों के समान तिलक लगाता है, वह अत्यंत सौभाग्यशाली हो जाता है और परमब्रम्ह, श्री हरि को प्रिय हो जाता है। जो मनुष्य मध्य में स्थान रखकर तिलक लगाता है, वह मुक्ति का अधिकारी हो जाता है।'' यजुर्वेद की कठ शाखा में कहा गया है। :- ''जो महात्मा तिलक लगाने के बाद चक्रधारी, परमब्रम्ह, परमात्मा, सबसे महान से महानतम, अपने भक्तों के ह्रदय में विराजित श्री विष्णु का मंत्रों द्वारा ध्यान करता है, वह निश्चित रूप से पवित्र हो जाता है।'' अथर्ववेद में कहा गया है। :- ''जो सौभाग्यशाली साधक जीवन भर चक्र के समान तिलक लगाता है, वह निश्चित रूप से सर्वव्यापी भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त होता है, जो भक्तों का अंतिम लक्ष्य है।''

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)