श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 15: श्री विष्णुप्रिया के साथ विवाह  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.15.4 
সন্ধ্যা-বন্দনাদি প্রভু করি’ ঊষঃ-কালে
নমস্করি’ জননীরে পডাইতে চলে
सन्ध्या-वन्दनादि प्रभु करि’ ऊषः-काले
नमस्करि’ जननीरे पडाइते चले
 
 
अनुवाद
भगवान ने सुबह-सुबह अपनी दैनिक पूजा की और अपनी माता को प्रणाम करने के बाद वे विद्यालय के लिए चले गए।
 
Bhagavan performed his daily puja early in the morning and after paying obeisance to his mother he left for school.
तात्पर्य
संध्या-वंदन के वर्णन के लिए हरि-भक्ति-विलस (3.140-155) का उल्लेख कर सकते हैं।

संध्या दो प्रकार की होती है—वैदिक और तांत्रिक। इनमें से वैदिक संध्या का संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है: " मंत्र का उच्चारण करते हुए आचमन करना चाहिए, ओं तद् विष्णोः परमं पदं सदापश्यन्ति सूरयो दिविव चक्षुर आततं—'भगवान विष्णु परम सत्य है, जिसके चरणकमलों को देखने के लिए सभी देवता सदैव उत्सुक रहते हैं। सूर्य-भगवान की तरह, वे अपनी ऊर्जा की किरणों से हर जगह व्याप्त हैं। अपूर्ण आँखों के लिए वे अव्यक्त प्रतीत होते हैं।' इसके बाद एक वैष्णव को खुद को ठीक से तिलक से सजाना चाहिए और हाथ धोने के बाद उन्हें वैदिक संध्या या तांत्रिक संध्या करनी चाहिए। कूर्म पुराण की व्यास-गीता में कहा गया है: 'एक व्यक्ति को कुशा घास से बनी एक चटाई पर पूर्व की ओर मुंह करके ठीक से बैठना चाहिए और संध्या ध्यान में शामिल होने से पहले नियंत्रित दिमाग के साथ तीन बार प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। यह वैदिक साहित्य का आदेश है।' मनु-संहिता में वर्णित है: 'एक ब्राह्मण को देवी सावित्री के मंत्र पर ध्यान करना चाहिए और उसका उच्चारण करना चाहिए, जो सूर्य मंडल के भीतर स्थित है। इसके बाद उसे संध्या पूजा करनी चाहिए।' यह भी कहा गया है: 'एक विद्वान व्यक्ति को पूर्व की ओर मुंह करके बैठना चाहिए और नियंत्रित दिमाग के साथ सावित्री मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।' संध्या मंत्र इस प्रकार हैं: ओं शन्न आपो धन्वन्याः शमनः सन्तु नूप्याः शन्नः समुद्रीया आपः शमनः सन्तु कूप्याः—'रेगिस्तान, समुद्र और कुएँ का पानी हमारे लिए लाभदायक हो।' ओं द्रुपाद इव मुमुचानः श्विन्नः स्नातो मलाद इव। पूतं पवित्रेणेवाज्यामापः शुद्धन्तु मे म-नसः.—'जैसे नदी के शुद्ध पानी में नहाने से सभी गंदगी साफ हो जाती है, उसी तरह इस पानी के शुद्ध गुणों से मैं अपने पापों से मुक्त हो जाऊं।' ओं आपो हिष्ठायो भुवस्ता न ऊर्ज्जे दधातना। महेरणाय चक्षसे.—'शुद्ध पानी दुनिया का आधार है; हम पानी के शुद्ध स्वाद का आनंद लेंगे और उसकी पूजा करेंगे।' ओं यो वः शिवतमोरसः तस्य भाजयतेह नः। उशतीर इव मातरः। ओं तस्मा अरंगमाम ये यस्य क्षायाय जिन्वथा। आपो जनयथा च नः.—'जैसे एक बच्चा माँ की शरण लेता है और उसके शरीर के अंग उसी से उत्पन्न होते हैं, उसी तरह हम केवल पानी से ही जीवित रहते हैं।' ओं ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसो'ध्य अजायततः। ततो रात्र्य अजायत ततः समुद्रो ऽर्णवः। समुद्राद-र्णवād-अधि-संवत्सरो ऽजायत। अहोरात्रां वidadhada विस्वस्य मिशतो वशी सूर्य-चंद्रमसौ धाता यथा पूवँ अलपयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षम अथो स्वः.—'सच्चा और कोमल बनो। तपस्या करो। तपस्या से रात पैदा होती है। रात से समुद्र पैदा होता है। समुद्र से पूरा साल पैदा होता है। इस ब्रह्मांडीय रूप को स्वीकार करने के बहाने, भगवान दिन और रात को बनाए रखते हैं। पिछले कल्प की तरह ही, भगवान ने इस कल्प में भी सूर्य और चंद्रमा की रचना की। उन्होंने दिन, रात, आकाश, दुनिया, स्वर्ग और आध्यात्मिक दुनिया भी बनाई है।'

अगर कोई संध्या नहीं करता है तो उसे पाप लगता है। कहा गया है: "संध्या से रहित व्यक्ति हमेशा के लिए अशुद्ध और हर चीज के लिए बेकार होता है। वह जो कुछ भी करेगा उसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, एक व्यक्ति जो अपनी संध्या उपासना की उपेक्षा करता है और अन्य धार्मिक गतिविधियों का प्रयास करता है, वह निश्चित रूप से हजारों नरकों में जाता है।"

इसके बाद तांत्रिक संध्या की प्रक्रिया को इस प्रकार समझाया गया है: "व्यक्ति को अपने मंत्र के भगवान की पानी और विभिन्न प्रसाद से पूजा करनी चाहिए। व्यक्ति को भगवान के सहयोगियों और सेवकों की भी पूजा करनी चाहिए और उन्हें भेंट चढ़ानी चाहिए।" बौधायन-स्मृति में कहा गया है: "एक विद्वान व्यक्ति आग में घी चढ़ाकर, पानी में फूल चढ़ाकर, अपने दिल में उन पर ध्यान करके और सूर्य मंडल में उपस्थित मानकर भगवान हरि की पूजा करते हैं।" पद्म पुराण में वर्णित श्री व्यासदेव और अम्बरीष महाराज के बीच बातचीत में कहा गया है: "सूर्य ग्रह और पानी में हरि को पानी चढ़ाना पूजा का सबसे अच्छा रूप है।"

तांत्रिक संध्या की प्रक्रिया इस प्रकार है: "इसके बाद व्यक्ति को मूल-मंत्र का जाप करना चाहिए और 'मैं आपको जल का यह अर्घ्य अर्पित कर रहा हूँ' का जाप करते हुए श्री कृष्ण के चरण-कमलों का ध्यान करना चाहिए। इसका जाप करते हुए किसी बुद्धिमान व्यक्ति को तीन बार भगवान को जल अर्पित करना चाहिए। व्यक्ति को कामा-गायत्री मंत्र का दस बार जाप करते हुए सूर्यमंडल में विराजमान कृष्ण का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद व्यक्ति को कृष्ण से प्रार्थना करनी चाहिए और कहना चाहिए, 'कृपया मेरे अपराधों को क्षमा करें' और फिर उसे सूर्य को अर्घ्य अर्पित करना चाहिए।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)