श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 15: श्री विष्णुप्रिया के साथ विवाह  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  1.15.217 
সে প্রভুর বিভা লোক দেখযে সাক্ষাত্
তেঞি তা’ন নাম—’দযাময’ ’দীননাথ’
से प्रभुर विभा लोक देखये साक्षात्
तेञि ता’न नाम—’दयामय’ ’दीननाथ’
 
 
अनुवाद
चूँकि भगवान ने सभी को अपना विवाह देखने की अनुमति दी थी, इसलिए उन्हें दयामय, अर्थात् वे जो सबसे दयालु हैं, तथा दीनानाथ, अर्थात् वे जो पतितों के स्वामी हैं, के नाम से जाना जाता है।
 
Because the Lord allowed everyone to witness His wedding, He is known as Dayamaya, meaning the most merciful, and Dinanath, meaning the Lord of the fallen.
तात्पर्य
वैकुण्ठ में अपनी मूल संवैधानिक स्थिति में लाने के लिए, और ऐसी सेवा के लिए पात्रता प्रदान करने के लिए, जो कि देवताओं द्वारा भी दुर्लभ रूप से प्राप्त की जाती है, भौतिक रूप से आसक्त पतित व्यक्तियों को दयालु ज्ञान प्रदान करके भौतिक उपभोग की इच्छा को नष्ट करने के लिए, सबसे दयालु भगवान ने आम लोगों की आँखों के सामने अपने दिव्य विवाह के लीलाओं का प्रदर्शन किया। यही कारण है कि पवित्र निष्ठावान भक्त विनम्रतापूर्वक भगवान को विभिन्न नामों से संबोधित करते हैं जैसे अहैतुक-कृपयामाय (वह जो निःकारण दयालु है), अमंदोद्या-दया-सिंधु (वह जो दया का सर्व-कल्याणकारी सागर है), और दीना-बंधु (वह है) जो पतितों का मित्र है), जो उनकी निःकारण दया को दर्शाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)