श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 14: भगवान की पूर्व बंगाल की यात्रा और लक्ष्मीप्रिया का तिरोभाव  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  1.14.87 
সে পাপিষ্ঠ আপনারে বোলায ’গোপাল’
অতএব তা’রে সবে বলেন ’শিযাল’
से पापिष्ठ आपनारे बोलाय ’गोपाल’
अतएव ता’रे सबे बलेन ’शियाल’
 
 
अनुवाद
उस पापी व्यक्ति ने अपना नाम गोपाल बताया और लोग उसे सियार कहने लगे।
 
That sinful person told his name as Gopal and people started calling him jackal.
तात्पर्य
शियाला या शियाल शब्द (संस्कृत शब्द शृगाल से) बंगाल के उन लोगों को दर्शाता है जो आमतौर पर डरते हैं, जो भागने के लिए प्रवृत्त हैं, जो चोर हैं, जो दुष्ट हैं, या जो कठोर शब्द बोलते हैं।

यद्यपि राधा-देश के पापी, नारकीय, मायावादी ब्रह्म-राक्षस ने खुद को सभी के लिए गोपाल के रूप में पेश किया, devotees ने उसे गोपाल कहने के बजाय, उसे एक झूठा तर्कवादी मायावादी सियार कहा। ("जो लोग भौतिक ज्ञान प्राप्त करते हैं वे अपने अगले जन्म में सियार के रूप में जन्म लेते हैं।")

महाप्रभु के गायब होने के सौ साल के भीतर ही कुछ मूर्ख नास्तिकों ने अपने गुरुओं को ठुकरा दिया और स्वयं को परमेश्वर के अवतार के रूप में विज्ञापित किया। इस संदर्भ में गौर-गण-चंद्रिका, जिसे श्रीमद विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा लिखा गया कहा जाता है, में निम्नलिखित लिखा गया है: "यह देखकर कि अन्य लोगों ने परम भगवान श्री गौरांग को ब्रह्मांड के स्वामी के रूप में स्वीकार कर लिया है, राधा-देश, बंगाल के कुछ मूर्ख लोग, जो शास्त्रीय ज्ञान से रहित थे, परम भगवान के रूप में कपड़े पहने घूमते रहे और अन्य मूर्खों को उनके सर्वोच्चता के बारे में समझाने का प्रयास करते रहे। उन नपुंसकों में वासुदेव नामक एक ब्राह्मण भी था, जिसने पागलपन से घोषणा की, 'मैं नंद महाराज का पुत्र गोपाल हूं।' इसलिए राधा-देश के लोगों ने इस ब्राह्मण को गोपाल के बजाय श्रीगाल या सियार कहा। विष्णुदास नाम के एक अन्य व्यक्ति ने कहा, 'मैं रघु वंश का पुत्र भगवान रामचंद्र हूं। मैं हनुमान के साथ वैकुण्ठ से उतरा हूं। हनुमान मेरे भक्त हैं।' ऐसे अपमानजनक बयानों के कारण, उन्हें राधा-देश के लोगों ने खारिज कर दिया और उन्हें बंदरों का नेता कहकर संबोधित किया गया। 'पृथ्वी के लोगों को मुक्ति दिलाने के लिए, मैं, भगवान नारायण, अपने वैकुंठ के निवास से प्रकट हुआ हूं।' इस तरह से शेखी बघारते हुए और अपने सिर पर ताज रखते हुए, बंगाल के एक दुष्ट ब्राह्मण माधव ने कुछ सस्ती प्रशंसा पाने के लिए खुद को परमेश्वर के रूप में विज्ञापित किया। इसलिए बंगाल के लोगों ने माधव को चूड़ाधारी या ताज पहनने वाले के रूप में संबोधित किया। यह माधव शूद्रों का बहुत ही कामुक पुजारी था। इसलिए वह श्री कृष्ण के रास नृत्य के मनोरंजन की नकल करता था। यह सुना जाता है कि इस ब्राह्मण को श्री चैतन्य महाप्रभु और वैष्णवों ने खारिज कर दिया था। इसलिए ऐसे लोगों के साथ संगति नहीं करनी चाहिए। यदि कोई ऐसा करता है, तो उसकी धार्मिकता नष्ट हो जाएगी, क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है: "जैसे तेल की एक बूंद पूरे पानी में फैल जाती है, यदि कोई ऐसे पापी व्यक्ति को छूता है, उससे बातचीत करता है, उसकी सांस से छूता है या उसके साथ भोजन करता है, तो उस व्यक्ति के पाप भी उसके पास फैल जाएंगे।" भक्ति-रत्नाकर (14.163-168, 180-183) में कहा गया है "किसी ने कहा,' हे भाइयों, भौतिकवादी जो भगवान कृष्ण से अपना मुंह मोड़ चुके हैं, बहुत स्वतंत्र हैं और धार्मिक सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। भौतिकवादियों के नेता ने लोगों को सामान्य रूप से धोखा देने के लिए रघुनाथ का पद ग्रहण किया है। इस दुर्व्यवहार करने वाले पापी ने अपने स्वयं के दर्शन का आविष्कार किया है, और कवियों का राजा होने का दावा करते हुए, वह बंग-देश में प्रचार करता है।' किसी अन्य व्यक्ति ने कहा,' मैंने देखा कुछ महान पापी दूसरों को भगवान कृष्ण की महिमा करने के बजाय उन्हें महिमामंडित करने के लिए प्रेरित करते हैं।' एक अन्य व्यक्ति ने कहा, 'राधा-देश में मल्लिका नाम का एक नीच ब्राह्मण है। कोई भी उससे ज्यादा दुष्ट नहीं है। वह महान पापी स्वयं को गोपाल कहते हैं। राक्षसों के योग्य एक भ्रामक दर्शन को बोलते हुए, वह सामान्य लोगों को धोखा देता है।' राधा-देश में, कांडारा नामक गांव में, ज्ञान दास का शुभ और गौरवशाली घर है। जय गोपाल नाम का एक कायस्थ भी उस स्थान पर रहता है। वह व्यक्ति ज्ञान के घमंड के कारण दुष्ट विचारों वाला बन गया। उसने घमंड से घोषणा की कि उसके गुरु के पास कोई ज्ञान नहीं है, और जब भी कोई उससे पूछताछ करता, तो वह दावा करता कि उसका परम-गुरु उसका गुरु है। वीरचंद्र प्रभु ने चतुराई से उसकी स्थिति का खुलासा किया और फिर उसे अस्वीकार कर दिया।" इस संबंध में श्रीमद् भागवतम्, दसवां स्कंध, अध्याय छियासठ और विष्णु पुराण (5.34) का उल्लेख करना चाहिए, जिसमें कृष्ण के द्वापर-युग के मनोरंजन का वर्णन है, जिसमें उन्होंने पौंड्रक वासुदेव, करूष के राजा, जो स्वयं की पूजा करते थे और कृष्ण की नकल करते थे, को मार डाला था। हरि-वंश, अध्याय 99-100, या 2.44-45 में पाए जाने वाले करवीरपुरा के राजा श्रीगाल वासुदेव का विवरण भी देखना चाहिए।

अहंकारोपासना अर्थात स्वयं को सर्वोच्च प्रभु, विष्णु या अवतार के रूप में प्रचारित करना, जो मायै के अंकुश में बंधे मूढ़ नास्तिक करते हैं, उनके विषय में श्रील जीव गोस्वामी ने अपने भक्ति-संदर्भ (276) में कहा है: "श्रीमद् भगवतम के इन श्लोकों में, व्यक्तिगत आत्मा को आराध्य सर्वोच्च मानने के विचार की घोर घृणा के साथ निंदा की गई है। एक उदाहरण देखा जा सकता है जब पौंड्रक वासुदेव ने कृष्ण को एक दूत के माध्यम से संदेश भिजवाया, 'मैं प्रभु वासुदेव हूं।' जब उग्रसेन की अध्यक्षता में शुद्ध भक्त यादवों ने दूत के मुंह से पौंड्रक वासुदेव के कृत्रिम प्रयासों के बारे में पगलाए हुए शब्द सुने, तो वे ज़ोर से हँसे। इसका कारण इस प्रकार के शास्त्रीय कथनों में मिलता है, जैसे श्रीमद् भागवतम (3.29.13) का निम्नलिखित श्लोक, जिसमें प्रभु कहते हैं: 'एक शुद्ध भक्त मेरी सेवा से रहित किसी भी प्रकार की मुक्ति -- सालोक्य, साष्टि, सामीप्य, सारूप्य या सायुज्य -- को स्वीकार नहीं करता, भले ही वे सर्वोच्च भगवान द्वारा भेंट की जाएं।' महा-भागवत श्री हनुमानजी भी इस प्रकार पुष्टि करते हैं: 'केवल एक मूर्ख ही प्रभु की सेवा छोड़कर स्वयं प्रभु बनने का प्रयास करेगा।' निष्किंचन भक्तों की महिमा करते हुए, श्रीमद् भागवतम (11.20.34) में अपने इन शब्दों के द्वारा सर्वोच्च प्रभु ने स्थापित किया है कि निष्काम-भक्ति सर्वोच्च अभिधेय, या साधना है: 'क्योंकि मेरे भक्तों के पास संतों जैसा आचरण और गहन बुद्धि होती है, वे पूरी तरह से मुझे समर्पित हो जाते हैं और मेरे अलावा कुछ भी नहीं चाहते। निश्चित रूप से, यदि मैं उन्हें जन्म और मृत्यु से मुक्ति प्रदान कर दूं, तो भी वे इसे स्वीकार नहीं करते।'

जो मायै के अंकुश में बंधे तुच्छ पतित प्राणियों को मायै को नियंत्रित करने वाले सर्वोच्च प्रभु के रूप में स्वीकार करते हैं, वे स्वयं अत्यधिक पतित होते हैं; उनकी दयनीय पतित अवस्था की कोई तुलना नहीं है। श्री चैतन्यचंद्र चतुर्दश लोक के साथ-साथ नवद्वीप, वृंदावन, गोलोक, वैकुंठ और चतुर्दश लोकों से परे पराव्योम के स्वामी हैं और व्रजेंद्र-नंदन से अभिन्न हैं; और यद्यपि नास्तिक देखता है कि उनकी महिमा की जा रही है और उन्हें स्वयं-रूप, अवतारी, साक्षाद भगवान और परमेश्वर के रूप में पूजा अर्पित की जा रही है, फिर भी वह मिथ्या रूप से उनकी नकल करके उनके साथ प्रतिस्पर्धा करने का प्रयास करता है; इस प्रकार उनकी बदकिस्मती की कोई सीमा नहीं है। श्री चैतन्य-चंद्रामृत (32) में कहा गया है: "वैदिक कर्मकांड के अनुयायियों की निंदा की जानी चाहिए! कठोर तपस्या करने वालों की निंदा की जानी चाहिए! मूढ़ मूर्खों की निंदा की जानी चाहिए जिनके मुंह से 'मैं ब्रह्म हूं' के शब्द निकलते हैं! कृष्ण से भिन्न चीजों के स्वाद में मस्त पुरुषों की आड़ में छिपे इन जानवरों के लिए हम क्यों विलाप करते हैं? हाय! उन्होंने गौरा भगवान के अमृत की एक बूंद तक नहीं चखी है!" [निम्नलिखित भावार्थ भी इस श्लोक पर लागू होता है।]

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)