श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 14: भगवान की पूर्व बंगाल की यात्रा और लक्ष्मीप्रिया का तिरोभाव  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  1.14.78 
উদ্দেশে আমরা সবে তোমার টিপ্পনী
লৈ’ পডি, পডাই শুনহ, দ্বিজ-মণি!
उद्देशे आमरा सबे तोमार टिप्पनी
लै’ पडि, पडाइ शुनह, द्विज-मणि!
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, कृपया हमारी बात सुनें। हम केवल आपके ही उपदेशों का अध्ययन, अध्यापन और स्वीकार करते हैं।
 
O best of brahmanas, please listen to us. We study, teach, and accept only your teachings.
तात्पर्य
उद्देशे शब्द का अर्थ होता है "अपरोक्ष रूप से (तुम्हारी स्वीकृति या संतुष्टि) का लक्ष्य करके)।" पद्मावती के तट पर रहने वाले विद्वानों ने कल्प व्याकरण पर प्रभु द्वारा रचित वृत्ति की सहायता से अध्ययन किया और अपने छात्रों को पढ़ाया। इससे यह समझ में आता है कि शिक्षकों के शिरोमणि निमाई पंडित के अधीन अध्ययन करते हुए, पद्मावती के तट से कुछ छात्रों ने उनकी वृत्ति एकत्र की, अपने-अपने गांवों में लौट आए, और वह वृत्ति अपने शिक्षकों को दे दी। किसी भी मामले में, हम प्रभु की वृत्ति को कहीं भी पुस्तक के रूप में नहीं पाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)