श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 14: भगवान की पूर्व बंगाल की यात्रा और लक्ष्मीप्रिया का तिरोभाव  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.14.23 
যা’র বা না থাকে কিছু পূর্বাদৃষ্ট-দোষে
সেই তৃণ, জল, ভূমি দিবেক সন্তোষে
या’र वा ना थाके किछु पूर्वादृष्ट-दोषे
सेइ तृण, जल, भूमि दिबेक सन्तोषे
 
 
अनुवाद
“यदि उसके पिछले अपवित्र कार्यों के कारण उसके पास कुछ भी नहीं है, तो उसे अपने मेहमानों को एक पुआल की चटाई, थोड़ा पानी और लेटने के लिए जगह देकर संतुष्ट करना चाहिए।
 
“If he has nothing because of his past impure actions, he should satisfy his guests by giving them a straw mat, some water and a place to lie down.
तात्पर्य
लालची प्राकृत-सहजिया, जो क्रूर हैं और अपनी जीभ और पेट को संतुष्ट करने में कुशल हैं, वर्तमान में चैतन्‍याचंद्र के पंथ के प्रचारक होने के रूप में अपनी पहचान बता रहे हैं, और इस तरह वे वैष्‍णव संन्‍यासी को उनके अधिकार की पुआल की चटाइयों से वंचित कर रहे हैं। उनके प्रति उनके विरोधी होने का पर्दाफाश करने के लिए, श्री चैतन्‍याचंद्र ने ये सर्वश्रेष्‍ठ गृहस्‍थाश्रम लीलाएं प्रदर्शित की हैं। प्रभु ने गृहस्‍थों के लिए उचित गतिविधियों के द्वारा सभी को निर्देश दिया है कि मेहमानों और संन्‍यासियों का सम्‍मान करना है। लेकिन कुछ लोग, जो स्‍वयं को उनके अनुयायी बताते हैं, एकदम विपरीत कार्य करते हैं। कुछ वर्ष पहले, डाका शहर में, एक लालची ब्राह्मण, जो कि एक जाति गोस्‍वामी का तथाकथित शिष्‍य था और पवित्र नाम, मंत्रों और श्रीमद भागवतम्‍ का विक्रय करके अपनी आजीविका चलाता था, ने कुछ त्रिदण्‍डी-संन्‍यासी और ब्रह्मचारियों, जो वहां मेहमान के रूप में पहुँचे थे, के साथ बहुत ही क्रूर व्यवहार किया ताकि उन्‍हें विष्‍णु के मध्‍याह्नकाल के भोजन से वंचित किया जा सके। लोगों को ऐसे व्यवहार से बचाने के लिए, प्रभु ने स्‍वयं मेहमानों और संन्‍यासियों को शरण और भोजन देने की लीलाएँ प्रदर्शित कीं। हाय! प्रभु की मेहमानों और संन्‍यासियों के प्रति स्‍नेहपूर्ण और सावधानीपूर्वक भेदभावरहित दया वितरण की लीला पर विचार करें। और फिर उन लोगों के प्रयासों पर विचार करें जो चैन्‍न्‍य के प्रतिकूल हैं और जो उनके पंथ के प्रचार के नाम पर मेहमानों, संन्‍यासियों को परेशान करते और उनका विरोध करते हैं जो श्री चैन्‍न्‍य की शरण में हैं!! केवल डाका शहर में नहीं, कुछ दिन पहले, कुलिया-नगर (नवद्वीप) में, कुछ ऐसे लोगों ने कुछ क्रूर कुकर्मियों की सहायता से, सम्‍मान प्रकट करने के बजाय, निर्दोष वैष्‍णव संन्‍यासियों, ब्राह्मणों और भक्‍त स्त्रियों पर अनुचित रूप से हमला किया जो धाम की परिक्रमा में भाग लेने के लिए आए थे। ये सभी महज श्री चैतन्यदेव की शिक्षाओं के प्रतिकूल दुष्‍प्रयास हैं। [यह भाव इस अध्‍याय के पद 25-27 पर भी लागू होता है।]
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)