श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 14: भगवान की पूर्व बंगाल की यात्रा और लक्ष्मीप्रिया का तिरोभाव  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.14.22 
গৃহস্থ হৈযা অতিথি-সেব না করে
পশু-পক্ষী হৈতে ’অধম’ বলি তা’রে
गृहस्थ हैया अतिथि-सेव ना करे
पशु-पक्षी हैते ’अधम’ बलि ता’रे
 
 
अनुवाद
“यदि कोई गृहस्थ अपने अतिथियों की सेवा नहीं करता, तो उसे पशु-पक्षियों से भी नीचा समझा जाता है।
 
“If a householder does not serve his guests, he is considered lower than animals and birds.
तात्पर्य
वे निम्न श्रेणी के होते हैं पक्षियों से भी कि जो फक्के गृहस्थ केवल एकरात्रि के अतिथियों और नारायणों को प्रसन्न करनेवाले भ्रमणशील संन्यासियों का भी त्याग कर संभाल कर के अपना ही भोजन बनाकर खाते हैं और गार्हस्थ्य कर्मों में ही लगे रहते हैं। पशु-पक्षी आदि निम्नजाति के प्राणी अपने भोजन को संचित करने में तो अधिकतर हीन रहते ही हैं, क्योंकि वे उड़ते और चलते हुए ही अपना भोजन संग्रह करते हैं। मनुष्य ही तो उत्तम समाज के अधिकारी हैं। इसलिए उनको तो वर्णाश्रम धर्म का आचरण करना ही होगा। यदि वे उससे भी विमुख रहेंगे, तो केवल स्वोदर-पूर्ति में संलग्न रहनेवाले नग्न पशु-पक्षियों में ही उनकी गणना होगी। मनुष्य का कर्तव्य केवल स्वोदर-पूर्ति करना ही नहीं है, किन्तु नारायणों का सेवा-सामग्री संग्रह करना और उनकी रक्षा करना भी है। इसीलिए उनके समाज-धर्म में अन्न-जल देकर अतिथियों और नारायण को प्रसन्न करके जीवों का हित करनेवाले भिक्षुकों को आश्रय देने की व्यवस्था है। यदि वे इस कर्तव्य का अनुल्लंघन करते हैं, तो वे पशु-पक्षियों से भी निम्न श्रेणी के माने जायेंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)