जीवन के लक्ष्य को समझते हुए, मुक्तिदाता गलती से यह निष्कर्ष निकालते हैं कि तीनों तरह की पीड़ाओं से मुक्त हो जाना ही साध्य है, या जीवन का लक्ष्य। भौतिकवादी मानते हैं कि इंद्रियों से तुरंत पाया जाने वाला सुख ही जीवन का लक्ष्य है, और मुक्तिदाता मानते हैं कि निर्गुण ब्रह्म में विलीन हो जाना ही जीवन का लक्ष्य है। उनकी गलतफहमियों की जड़ केवल उनकी गलतियाँ हैं और कुछ नहीं। भगवान के हंस जैसे भक्त, मुक्तिदाताओं या भौतिकवादियों की अवधारणाओं का पालन नहीं करते बल्कि ईश्वर से प्रेम को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं। वे जानते हैं कि स्वर्गिक सुख और निर्गुण ब्रह्म में विलीन हो जाना केवल छल है। चूँकि बंगाल में विभिन्न समुदायों के घमंडी विद्वान जैसे भौतिकवादी, कर्मी और ज्ञानी साध्य और साधना के वास्तविक विज्ञान के बारे में अनजान थे, जब उनसे जीवन के लक्ष्य और उसे पाने के उपाय के बारे में तेज़ बुद्धिमान पवित्र ब्राह्मण तपन मिश्रा द्वारा पूछा गया, जो भगवान की सेवा करने के इच्छुक थे और वेद और उसके साथ जुड़े साहित्यों के सार को समझने के लिए सबसे योग्य थे, उन्हें कोई उचित उत्तर नहीं मिल सका।
