श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 14: भगवान की पूर्व बंगाल की यात्रा और लक्ष्मीप्रिया का तिरोभाव  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  1.14.117 
সাধ্য-সাধন-তত্ত্ব নিরূপিতে নারে
হেন জন নাহি তথা, জিজ্ঞাসিবে যাঙ্’রে
साध्य-साधन-तत्त्व निरूपिते नारे
हेन जन नाहि तथा, जिज्ञासिबे याङ्’रे
 
 
अनुवाद
वह जीवन के लक्ष्य और उसे प्राप्त करने के साधनों को लेकर उलझन में था। इसके अलावा, उसे कोई ऐसा भी नहीं मिल रहा था जो उसकी उलझन दूर कर सके।
 
He was confused about the purpose of life and the means to achieve it. Furthermore, he couldn't find anyone who could help him resolve his confusion.
तात्पर्य
जो प्रक्रिया किसी भी वांछित लक्ष्य को पाने के लिए अपनाई जाती है उसे साधना कहते हैं। धार्मिक ग्रंथ इस साधना को अभिधेय कहते हैं। प्रभु के साथ संबंध की जानकारी के अभाव के कारण, विभिन्न नई बनी बनाई रास्ते पूर्णता पाने के लिए बताए गए है और भक्तों द्वारा प्रैक्टिस किए जाते हैं। तपस्या, भजन, रीतियों से की जाने वाली पूजा, व्रत, वैदिक अध्ययन, कुम्भक, पूरक और रेचक के द्वारा सांस को नियंत्रित करना 1, अपने पूर्वजों के लिए प्रसाद चढ़ाना, त्याग, आसन, दिन में तीन बार स्नान, पवित्र स्थानों पर जाना, ध्यान और चिंतन मन को नियंत्रित करने के लिए, और फल की कामना से देवता की पूजा सामान्य रूप से साधना के रूप में उन गदहों जैसे लोगों द्वारा की जाती है जो भगवान की भ्रामक ऊर्जा से भ्रमित हैं। ये साधना बस जीवित प्राणियों को धोखा देने का दूसरा साधन हैं। वास्तव में, केवल वैष्णव ही जीवन के लक्ष्य और उसे पाने की प्रक्रिया का पता लगाने के लिए योग्य हैं। लेकिन अगर व्यक्ति जिनमें विष्णु के लिए भक्ति नहीं है, वे जीवन के लक्ष्य को पाने की प्रक्रिया का पता लगाने की कोशिश करते है तो बहुत ज्यादा संभावना है कि वो गुमराह हो जाए। खास तौर पर, हम देख सकते है कि अगर कोई मानसिक अनुमान की मदद से जीवन के लक्ष्य को पाने की प्रक्रिया का पता लगाने की कोशिश करेगा तो इसमें ग़लतियाँ, भ्रम, और बाधाएँ आएंगी और व्यक्ति जीवन के अंतिम, सच्चे लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाएगा।

जीवन के लक्ष्य को समझते हुए, मुक्तिदाता गलती से यह निष्कर्ष निकालते हैं कि तीनों तरह की पीड़ाओं से मुक्त हो जाना ही साध्य है, या जीवन का लक्ष्य। भौतिकवादी मानते हैं कि इंद्रियों से तुरंत पाया जाने वाला सुख ही जीवन का लक्ष्य है, और मुक्तिदाता मानते हैं कि निर्गुण ब्रह्म में विलीन हो जाना ही जीवन का लक्ष्य है। उनकी गलतफहमियों की जड़ केवल उनकी गलतियाँ हैं और कुछ नहीं। भगवान के हंस जैसे भक्त, मुक्तिदाताओं या भौतिकवादियों की अवधारणाओं का पालन नहीं करते बल्कि ईश्वर से प्रेम को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं। वे जानते हैं कि स्वर्गिक सुख और निर्गुण ब्रह्म में विलीन हो जाना केवल छल है। चूँकि बंगाल में विभिन्न समुदायों के घमंडी विद्वान जैसे भौतिकवादी, कर्मी और ज्ञानी साध्य और साधना के वास्तविक विज्ञान के बारे में अनजान थे, जब उनसे जीवन के लक्ष्य और उसे पाने के उपाय के बारे में तेज़ बुद्धिमान पवित्र ब्राह्मण तपन मिश्रा द्वारा पूछा गया, जो भगवान की सेवा करने के इच्छुक थे और वेद और उसके साथ जुड़े साहित्यों के सार को समझने के लिए सबसे योग्य थे, उन्हें कोई उचित उत्तर नहीं मिल सका।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)