श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 14: भगवान की पूर्व बंगाल की यात्रा और लक्ष्मीप्रिया का तिरोभाव  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  1.14.116 
হেনৈ সমযে এক সুকৃতি ব্রাহ্মণ
অতি-সারগ্রাহী, নাম—মিশ্র তপন
हेनै समये एक सुकृति ब्राह्मण
अति-सारग्राही, नाम—मिश्र तपन
 
 
अनुवाद
इसी बीच, तपन मिश्र नामक एक पवित्र हंस जैसे ब्राह्मण वहां पहुंचे।
 
Meanwhile, a holy swan-like Brahmin named Tapan Mishra arrived there.
तात्पर्य
शुक्रति ब्राह्मण वाक्यांश की इस प्रकार व्याख्या की गई है: इस ब्रह्मांड में, ब्रह्मवाद या परम ब्रह्म का ज्ञान, सबसे ऊँचा स्तर है और सभी पवित्र कार्यों का परम लक्ष्य है। यदि ब्रह्म का ज्ञाता अपने मन को परम ब्रह्म, भगवान विष्णु के चरणकमलों की सेवा में लगाता है, तो उसकी किस्मत की सीमा अतुलनीय है। गरुड़ पुराण में कहा गया है: "ऐसा कहा जाता है कि हजारों ब्राह्मणों में से, एक यज्ञ करने के लिए योग्य होता है, और ऐसे यज्ञ विशेषज्ञ यज्ञों के हजारों योग्य ब्राह्मणों में से, एक विद्वान ब्राह्मण सभी वैदिक ज्ञान से परे जा सकता है। उसे इन सभी ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। फिर भी, वैदिक ज्ञान को पार करने वाले ऐसे हजारों ब्राह्मणों में से, एक व्यक्ति विष्णु-भक्त हो सकता है, और वह सबसे प्रसिद्ध है। ऐसे हजारों वैष्णवों में से, जो भगवान कृष्ण की सेवा में पूरी तरह से स्थिर है, वह सबसे प्रसिद्ध है।" ऐसे व्यक्ति को सारग्राही या हंस जैसा कहा जाता है। सारग्राही के विपरीत भारवाही या गधा जैसा है। दूसरे शब्दों में, जो लोग वैदों और वैदिकों के अनुरूप साहित्य के उद्देश्य को समझने में असमर्थ हैं और जो मूर्खता के कारण बाहरी विचारों में व्यस्त हैं, वे सारग्राही नहीं, भारवाही हैं। भौतिकवादी, कर्मियों और ज्ञानियों को भारवाही कहा जाता है। केवल शुद्ध भक्त, या वैष्णव, चतुर और बुद्धिमान होते हैं। वे बेकार गधा जैसी मानसिकता को त्याग देते हैं और सभी शास्त्रों के गोपनीय उद्देश्य को समझने में उचित रूप से स्थित हो जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)