| श्री चैतन्य भागवत » खण्ड 1: आदि-खण्ड » अध्याय 14: भगवान की पूर्व बंगाल की यात्रा और लक्ष्मीप्रिया का तिरोभाव » श्लोक 111-112 |
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| | | | श्लोक 1.14.111-112  | সুবর্ণ, রজত, জল-পাত্র, দিব্যাসন
সুরঙ্গ-কম্বল, বহু-প্রকার বসন
উত্তম পদার্থ যত ছিল যা’র ঘরে
সবেই সন্তোষে আনি’ দিলেন প্রভুরে | सुवर्ण, रजत, जल-पात्र, दिव्यासन
सुरङ्ग-कम्बल, बहु-प्रकार वसन
उत्तम पदार्थ यत छिल या’र घरे
सबेइ सन्तोषे आनि’ दिलेन प्रभुरे | | | | | | अनुवाद | | उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक भगवान को सोना, चांदी, जलपात्र, आसन, रंग-बिरंगे कंबल, विभिन्न वस्त्र तथा अपने घर में जो भी अन्य उत्तम वस्तुएं थीं, सब भेंट कीं। | | | | He happily offered the Lord gold, silver, water pots, seats, colourful blankets, various clothes and all the other fine things he had in his house. | | ✨ ai-generated | | |
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