लक्ष्मीदेवी की प्रतिकृति शरीर और उनके गायब होने के बारे में इस प्रकार बताया गया है। श्री लक्ष्मीप्रिया-देवी भगवान के परम व्यक्तित्व, गौर-नारायण की आंतरिक आध्यात्मिक शक्ति हैं। गौर-गणोद्देश-दीपिका (45) में महा-लक्ष्मी का वर्णन इस प्रकार है: "वह जो पहले श्री जानकी, रुक्मिणी और लक्ष्मी के रूप में प्रकट हुई थीं, अब चैतन्य महाप्रभु के क्रीड़ाओं में लक्ष्मी के रूप में प्रकट हुई हैं।" संस्कृत पुस्तक चैतन्य-चरितामृत-महाकाव्य (3.7 और 13) में कहा गया है: "यह लक्ष्मी [नवद्वीप की] उस लक्ष्मी [वैकुंठ की] का अवतार है, "और" लक्ष्मी ने इस दुनिया में व्यक्तिगत रूप से अवतार लिया है।" महा-लक्ष्मी का वर्णन करते समय, कृष्ण की रानियाँ और व्रज की गोपियाँ, श्री जीव प्रभुपाद ने अपने श्री कृष्ण-संदर्भ में कहा है: "दूसरे (भागवत) संदर्भ में यह स्थापित किया गया है कि भगवान परम निरपेक्ष सत्य हैं और उनके पास दो ऊर्जाएँ हैं। दोनों में से, पहला भगवान से संबंधित है क्योंकि उनकी आंतरिक शक्ति है और वैष्णवों के लिए भगवान के रूप में पूजा योग्य है। सर्वोच्च भगवान की सर्वोच्च स्थिति इस स्वरूप-शक्ति के कारण है। दूसरा, माया, भौतिक दुनिया की तरह, वैष्णवों द्वारा उपेक्षित होने लायक है; वह भगवान की ऊर्जा का रूपांतरण है। दुनिया की अभिव्यक्ति इस बहिरंग-माया-शक्ति या भ्रामक बाहरी ऊर्जा के कारण है। इन दोनों शक्तियों में से, लक्ष्मी शब्द का उपयोग पूर्व, स्वरूप-शक्ति को दर्शाने के लिए किया जाता है, जैसे शब्द भागवत का उपयोग उस व्यक्ति को इंगित करने के लिए किया जाता है जिसके पास ये दो ऊर्जाएँ होती हैं। यह भागवत-संदर्भ में भी स्पष्ट रूप से दिखाया गया है। दो शहरों (मथुरा और द्वारका) में इस स्वरूप-शक्ति को श्री-महिषी, कृष्ण की रानियों के रूप में जाना जाता है। चूंकि गोपाल-तपनी उपनिषद में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भगवान के अप्रकट क्रीड़ाओं में श्री रुक्मिणी मथुरा में निवास करती हैं, इसलिए अन्य सभी रानियों को भी वहाँ रहना होगा। इसमें यह भी कहा गया है कि कृष्ण की रानियाँ भी उनकी स्वरूप-शक्ति की श्रेणी से संबंधित हैं; इसलिए स्वरूप-शक्ति के रूप में उनकी स्थिति में उन्हें लक्ष्मी के समान स्थिति में होना आवश्यक है। इस तरह कृष्ण की रानियों की स्वाभाविक रूप से भगवान की स्वरूप-शक्ति से संबंधित होने की पुष्टि की गई है। श्रीमद भागवतम (10.60.9) में कहा गया है: 'भगवान अपने क्रीड़ाओं को अधिनियमित करने के लिए विभिन्न रूप धारण करते हैं, और वह प्रसन्न थे कि भाग्य की देवी रुक्मिणी ने अपनाया था जो उनके लिए उनके संघ के रूप में सेवा करने के लिए उपयुक्त था।' इस पद का अर्थ बहुत स्पष्ट है। इसलिए, चूंकि रुक्मिणी ने भगवान की सेवा करने के लिए उपयुक्त रूप धारण किया, वह निश्चित रूप से लक्ष्मी के स्तर पर है। और चूंकि लक्ष्मी, जो वैकुंठ की देवी के रूप में प्रसिद्ध हैं, रुक्मिणी में विलय हो गई हैं, महा-लक्ष्मी रुक्मिणी के पास लक्ष्मी का आंतरिक मनोदशा है और हर तरह से पूर्ण है। क्योंकि आध्यात्मिक ऊर्जा, या स्वरूप-शक्ति, और ऊर्जावान, या शक्तिमान, पूरी तरह से मतभेदों से मुक्त (या नोडिफ़रेंट) हैं, इसलिए उनके बीच तुलना के विषय और वस्तु के रूप में कोई रिश्ता नहीं हो सकता है। इसलिए उनके बीच समानता की अनुपस्थिति है (जैसे कि वास्तविक वस्तु और उसकी छाया या प्रतिबिंब के बीच अंतर), दूसरे शब्दों में, वे नोडिफ़रेंट या एक हैं। श्रीमद भागवतम (10.60.44) में रुक्मिणी व्यक्तिगत रूप से निम्नलिखित शब्द बोलती हैं: 'हे कमल के आंखों वाले, यद्यपि आप स्वयं के भीतर संतुष्ट हैं और इस प्रकार शायद ही कभी अपना ध्यान मेरी ओर देते हैं, कृपया मुझे अपने पैरों के लिए स्थिर प्रेम का आशीर्वाद दें।' (इस कथन में रुक्मिणी कृष्ण के संदेह या आपत्ति को दूर कर रही हैं।) 'यदि तुम कहते हो,"मैं व्यक्तिगत रूप से आत्म-संतुष्ट हूं, तो मैं तुम्हारे लिए लगाव कैसे रख सकता हूं?" जवाब में, मैं कहती हूं कि तुम्हारी दृष्टि उदासीन है, दूसरे शब्दों में, यद्यपि तुम सर्वशक्तिमान हो, तुम मुझे, अपनी स्वरूप-शक्ति और अपने आप को अविभाज्य के रूप में देखते हो। तात्पर्य यह है कि चूंकि स्वरूप-शक्ति और शक्तिमान अविभाज्य (या नोडिफ़रेंट) है, या वे संवैधानिक रूप से गैर-भिन्न हैं क्योंकि उनका एकमात्र भेद उनके संवैधानिक संबंध के रूप में विषय और आश्रय, उपभोग करने वाला और आनंद लेने वाला हैं, इसलिए भले ही आप आत्मराम हैं, मेरे लिए आपका लगाव उचित है।'
विष्णु पुराण (1.8.15) में कहा गया है:
नित्यैव सा जगत-माता विष्णोः श्रीर नापायिनी
यथा सर्व-गतो विष्णुस्तथैवेयं द्विजोत्तमाः
"हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, भगवान विष्णु की स्वरूप-शक्ति ब्रह्मांड की शाश्वत माता है; वह विष्णु से कभी अलग नहीं होती। जिस तरह भगवान विष्णु सर्वत्र विद्यमान हैं, उसी तरह उनकी स्वरूप-शक्ति, महा-लक्ष्मी भी सर्वत्र विद्यमान हैं।" विष्णु पुराण (1.9.143) में भी कहा गया है:
देवत्वे देव-देहयम् मानुष्यत्वे च मानुशी
विष्णोर देहानुरूपां वै करोत्य एषात्मनस्तनुम्
"जब भगवान देवता के रूप में प्रकट होते हैं, तो उनकी शक्ति [देवी लक्ष्मी] देवांगना का रूप धारण करती हैं, और जब वे मनुष्य के रूप में प्रकट होते हैं, तो वे मनुष्य जैसा रूप धारण करती हैं। इस प्रकार वह भगवान विष्णु द्वारा स्वीकृत शरीर के अनुसार एक शरीर धारण करती हैं ताकि उनके लीलाओं में सहायता मिल सके।" ब्रह्म-सूत्र (2.3.10) पर अपनी टीका में श्री माधवाचार्य भागवत-तंत्र से निम्नलिखित श्लोक उद्धृत करते हैं:
शक्ति-शक्तिमतोश्चापि न विवेधः कथंचन
अविभिन्नापि स्वेच्छादि- भेदैरपि विभाध्यते
"शक्ति और शक्तिमान के बीच कोई वास्तविक अंतर नहीं है, लेकिन कभी-कभी अपनी इच्छा से वे अलग दिखाई देते हैं।" विष्णु-संहिता कहती है: शक्ति-शक्तिमतोश्चापि न भेदः कश्चित् ईष्यते - "निश्चित रूप से ऊर्जा और ऊर्जावान के बीच कोई अंतर नहीं है।" ऐसे शास्त्रीय कथनों से हम समझ सकते हैं कि ऊर्जावान विष्णु और उनकी संबंधित स्वरूप-शक्ति अभिन्न हैं। बाहरी भ्रामक ऊर्जा, या भौतिक प्रकृति, इस स्वरूप-शक्ति लक्ष्मी की अधीनस्थ छाया है। श्रीमद् भागवतम (1.7.23) में अर्जुन श्री कृष्ण से इस प्रकार कहते हैं: "आपने अपनी आध्यात्मिक शक्ति [या स्वरूप-शक्ति] के बल पर भौतिक ऊर्जा के प्रभावों को दूर कर दिया है। आप हमेशा शाश्वत आनंद और अलौकिक ज्ञान में स्थित रहते हैं।" इसलिए सृजन, पालन और विनाश, जो भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के परिवर्तन हैं - रजोगुण, सतोगुण, और तमोगुण - कभी भी भगवान विष्णु, उनकी संबंधित स्वरूप-शक्ति, या उनके वैभव जैसे कि उनके निवास और सहयोगियों पर हमला नहीं कर सकते, क्योंकि उनके शरीरों और आत्माओं में कोई अंतर नहीं है जैसे कि जीवों में होता है जो माया द्वारा नियंत्रित होते हैं और अपने कर्मों के फलों का आनंद लेने के लिए मजबूर होते हैं। वे सभी माया के अधिकार क्षेत्र से परे, भौतिक प्रकृति के गुणों से अछूते, शाश्वत रूप से शुद्ध और आध्यात्मिक हैं। श्री कृष्ण-संदर्भ (93) में श्रीमद् भागवतम् (1.3.1) पर श्री माधवाचार्यपाद की भागवत-तात्पर्य टीका इस प्रकार उद्धृत की गई है: "तंत्र-भागवत कहता है:
अगृह्नाद व्यसृज चति कृष्ण राम आदि कां तनुम्
पठ्यते भगवान ईशो मूढ़ बुद्धि व्यपेक्षया
'शास्त्रीय कथन कि सर्वोच्च भगवान ने कृष्ण और राम जैसे अवतारों में शरीर को स्वीकार किया है और त्याग दिया है, केवल मूर्ख लोगों की मानसिकता को संतुष्ट करने के लिए वर्णित हैं।' वराह पुराण में कहा गया है:
न तस्य प्राकृता मूर्तिर् मांस-मेदो'स्थि-सम्भवा
न योगित्वाद ईश्वरत्वात् सत्य-रूपो'च्युतो विभुः
'परमेश्वर और उनकी स्वरूप-शक्ति में मांस, हड्डियों और मज्जा से बने भौतिक रूप नहीं होते। हालाँकि, उनका दिव्य रूप रहस्यपूर्ण पूर्णता का परिणाम नहीं है, क्योंकि वह सीधे भगवान् के व्यक्तित्व हैं, उनका रूप शाश्वत, अचूक और श्रेष्ठ है।' महा-वराह पुराण में कहा गया है: 'सर्वोच्च भगवान् विष्णु से संबंधित सब कुछ, उनके शरीर से शुरू होकर, शाश्वत और अमर है, भौतिक शुद्धता और अशुद्धता दोनों से रहित है, और कभी भी पदार्थ से पैदा नहीं हुआ; दूसरे शब्दों में, वे भौतिक नहीं हैं। वे पूरी तरह से निर्बाध आनंद की वस्तुएं हैं और पूरी तरह से आध्यात्मिक हैं, वे सभी दिव्य गुणों से भरी हुई हैं और एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। सभी गुणों के स्वामी होने के कारण, वे एक-दूसरे के साथ संबंध में श्रेष्ठता और हीनता से पूर्णतया रहित हैं। सर्वोच्च भगवान विष्णु के शरीर और आत्मा के बीच कभी कोई अंतर नहीं होता है, लेकिन जब हम यह कथन सुनते हैं कि भगवान विष्णु ने शरीर स्वीकार किया तो यह एक अभिनेता की तरह है जो किसी नाटक में अपने शरीर की सुरक्षा के लिए दूसरा हाथ लेता है। यद्यपि भगवान विष्णु, जो भौतिक धारणा से परे हैं, प्रकट होते हैं और गायब हो जाते हैं, 'कृष्ण का उनका रूप,' 'राम का उनका रूप,' जैसे कथन केवल उन्हीं पर लागू होते हैं, क्योंकि उनके पास अविरल आध्यात्मिक वैभव है।' कूर्म पुराण में कहा गया है: 'हालाँकि सर्वोच्च भगवान न तो विशाल हैं और न ही असीम, वह पूरी तरह से विशाल और असीम हैं। यद्यपि भगवान आध्यात्मिक वैभव रखने के कारण विरोधाभासी प्रतीत होते हैं, सर्वोच्च भगवान पर किसी भी प्रकार के सांसारिक दोषों का आरोप लगाना अनुचित है। फिर भी भले ही भौतिक धारणा के माध्यम से स्पष्ट विरोधाभासी गुण देखे जाते हैं, यह समझना होगा कि वह उनमें अकल्पनीय रूप से मेल खाते हैं।' विष्णु-धर्मोत्तर में कहा गया है: 'क्योंकि सर्वोच्च भगवान पुरुषोत्तम के पास सभी वैभव हैं, सभी दिव्य गुण उनमें पाए जाते हैं। लेकिन किसी भी तरह से उन पर दोष लागू नहीं किए जा सकते, क्योंकि वह सर्वोच्च वस्तु है। कुछ मूर्ख व्यक्ति निष्कर्ष निकालते हैं कि गुण और दोष दोनों माया से प्राप्त होते हैं या माया के गुण होते हैं। इसके उत्तर में, यह कहा गया है कि चूंकि परम सत्य में माया या माया से कोई संबंध नहीं है, तो माया से संबंधित गुण कैसे मौजूद हो सकते हैं? इसलिए प्रभु के दिव्य गुण माया से प्राप्त या माया के गुण नहीं हैं; वे उनके वैभव से पैदा हुए हैं। क्योंकि वह निर्दोष (निरस्त कुहक अप्राकृत-"भ्रम के दिव्य अपव्ययकर्ता") नियंत्रक हैं, विद्वान विद्वान उन्हें सर्वोच्च वस्तु के रूप में जानते हैं।"'
माया से भ्रमित मूर्ख भौतिकवादियों द्वारा उठाया गया संदेह कि महा-लक्ष्मी श्री लक्ष्मीदेवी, जो गौरा-नारायण की स्वरूप-शक्ति हैं, ने एक सांसारिक आत्मा की तरह सांप के काटने के कारण अपना शरीर छोड़ दिया, श्रीमद भागवतम, धर्मग्रंथों का श्रेष्ठ रत्न, और आचार्य, जो श्रीमद भागवतम का अनुसरण करते हैं, द्वारा कृष्ण के अंतर्धान के अपने विवरण में ठीक से साफ किया गया है।
श्रीमद भागवतम (1.14.8) में युधिष्ठिर, भीमसेन से इस प्रकार कहते हैं: यदात्मनो 'अंगम आक्रीडं भगवान् उत्सिसृक्षति-"क्या भगवान के लिए अपने सांसारिक शगलों को छोड़ने का समय आ गया है?"
"इस श्लोक में अंगम शब्द का अर्थ है 'पृथ्वी'। ब्रह्म-तर्क में कहा गया है:
यदा त्यागादिरुच्येत पृथिव्याद्य-अंग-कल्पना
तदा ज्ञेया न हि स्वांगं कदाचिद् विष्णुर उत्सृजेत
'जब शास्त्र प्रभु के अंतर्धान के संबंध में "त्याग" जैसे शब्दों का उपयोग करते हैं तो यह पृथ्वी को संदर्भित करता है, क्योंकि भगवान विष्णु कभी भी अपने अंग को नहीं छोड़ते।'" (श्री माध्वाचार्य का भागवत-तात्पर्य)
"आक्रीड शब्द शगलों के स्थान, या दूसरे शब्दों में, इस भौतिक जगत को संदर्भित करता है। 'अंग' शब्द का अर्थ है 'उनकी अपनी भूमि,' क्योंकि 'पृथ्वी उनका शरीर है' और अन्य धर्मग्रंथीय कथन इस तथ्य के प्रमाण हैं।" (श्री विजयध्वज)
अन्यथा: "कब सर्वोच्च भगवान अपने शगलों को छोड़ने की इच्छा करेंगे, या दूसरे शब्दों में, शगलों में सहायता करने वाले अंग को छोड़ देंगे, या दूसरे शब्दों में, मनुष्य के नाटक (भौतिक जगत में मनुष्य होने की गतिविधियों की नकल) को छोड़ देंगे - क्या वह समय आ गया है?" (श्रीधर स्वामीपाद)
"अंग शब्द उस सांसारिक सार्वभौमिक रूप को संदर्भित करता है जिसे अपने निवास स्थान पर लौटते समय त्याग दिया जाता है।" (क्रम-सँदर्भ)
श्रीमद् भागवतम् (1.15.34-36) में श्री सूत गोस्वामी, शौनक के नेतृत्व में संतों से इस प्रकार कहते हैं:
ययाहरद् भुवो भारं ताँ तनुं विजहाँव अजः
कंटकं कंटकेनेव द्वयं चापीशितुः समम्
यथा मत्स्यादि-रूपाणि धत्ते जह्याद् यथा नटः
भू-भारः क्षपितो येन जहौ तच्च कलेवरम्
यदा मुकुन्दो भगवान् इमां महिम्
जहौ स्व-तंवा श्रवणीय-सत-कथाः
तदाहर एवाप्रतिबुद्ध-चेतसां
अभद्र-हेतुः कलिर् अनवर्तत
"सर्वोच्च अजन्मे, भगवान श्री कृष्ण ने यादव वंश के सदस्यों को अपने शरीर त्यागने के लिए प्रेरित किया, और इस प्रकार उन्होंने दुनिया के बोझ को कम किया। यह कार्य एक कांटे को दूसरे कांटे से निकालने जैसा था, हालाँकि दोनों नियंत्रक के लिए समान हैं। परम भगवान ने पृथ्वी के बोझ को कम करने के लिए जो शरीर प्रकट किया था, उसे त्याग दिया। जैसे जादूगर विभिन्न शरीरों को स्वीकार करने के लिए एक शरीर को त्याग देता है, जैसे मत्स्य अवतार और अन्य। जब भगवान का व्यक्तित्व, भगवान कृष्ण, अपने उसी रूप में इस पृथ्वी को छोड़कर चले गए।"
"भगवान और यादवों (जो भगवान के शाश्वत सहयोगी नहीं थे, बल्कि सामान्य नश्वर प्राणी थे) के बीच भेद को न समझकर, मूर्ख भौतिकवादी लोग उन्हें समान मानते हैं। श्री सूत गोस्वामी इन दो छंदों में [ऊपर उद्धृत पहले दो] में उनके बीच स्पष्ट रूप से भेद स्थापित कर रहे हैं। यया शब्द इंगित करता है कि भगवान ने यादवों के शरीर (माया से विचलित सामान्य नश्वर प्राणियों के बराबर) के माध्यम से पृथ्वी के बोझ को कम किया (जैसे एक कांटा दूसरे कांटे से निकाला जाता है)। चूँकि यादवों के शरीर और पृथ्वी पर भार डालने वालों के शरीर दोनों ही भगवान द्वारा नष्ट किए जाने के योग्य थे, दोनों समान हैं, दूसरे शब्दों में, दोनों भौतिक हैं।
"भगवान कैसे मत्स्य जैसे रूपों (शरीरों) को स्वीकार करते हैं और छोड़ते हैं, इसका वर्णन निम्नलिखित उदाहरण के साथ किया जा रहा है: जैसे एक अभिनेता, अपने मूल रूप में रहते हुए, दूसरे रूप को स्वीकार करता है और छोड़ देता है, उसी प्रकार परम भगवान ने भी उस रूप (साधारण आंखों को दिखाई देने वाले) को त्याग दिया और प्रकट किया। उनका मूल आध्यात्मिक रूप।
" चूंकि भगवान उसी शरीर के साथ वैकुंठ लौटे, यह समझा जाता है कि उन्होंने उसी शरीर के साथ इस दुनिया को छोड़ दिया।" (श्रीधर स्वामीपाद)
"इस स्थान पर [ऊपर उद्धृत श्रीमद भागवतम् के तीन श्लोकों में] तनु, रूप और कलेवर तीन शब्द भगवान की दो भावनाओं को दर्शाते हैं- पृथ्वी के बोझ को कम करने की उनकी इच्छा और देवताओं को बनाए रखने की उनकी इच्छा (वे उनके शरीर को संदर्भित नहीं करते हैं)। इसी तरह, श्रीमद भागवतम (3.20.28, 39, 41, 46 और 47) के अन्य छंदों में ये शब्द ब्रह्मा की भावनाओं को दर्शाते हैं (शरीर नहीं)। यदि कोई भगवान ब्रह्मा के संबंध में इस व्याख्या को स्वीकार करता है, तो परम भगवान के संबंध में इसे स्वीकार करना भी उचित है। चूंकि भगवान की ये भावनाएँ (अपनी स्वयं की या वास्तविक नहीं हैं, लेकिन) आभास-रूप हैं, या उनके रूप के संकेत हैं, इसलिए काँटे का उदाहरण उचित है (दूसरे शब्दों में, एक व्यक्ति जो काँटे को निकालना चाहता है, उसके लिए दोनों काँटा और निकालने वाला काँटा समान है; इसी तरह, जो लोग पृथ्वी पर बोझ डाल रहे थे, या विशाल सार्वभौमिक रूप, और यादवों के शरीर, जिनके शरीर सामान्य नश्वर प्राणियों के शरीर के समान थे, परम भगवान के लिए समान थे)। इस संबंध में एक विस्तृत विवरण तीसरे (परमात्मा) संदर्भ में पाया जाता है।
“मत्स्य जैसे अवतारों में मत्स्यादि-रूप शैतानो को मारने की भावना को संदर्भित करते हैं। जैसे अभिनेता, अपने मूल वेश में रहते हुए, नायक या नायिका के भावों को स्वीकार और त्याग करते हैं, उसी तरह यह जानना चाहिए कि यह परमप्रभु पर भी लागू होता है। अन्यथा भगवद्-गीता (7.25) में कहा गया है: 'मैं योगमाया से आच्छादित हूँ और सभी लोगों के सामने नहीं हूँ;' पद्म पुराण, उत्तर-खंड में कहा गया है: 'योगी भगवान जनार्दन को अपनी भक्ति सेवा के बल पर देखते हैं, वह कभी भी गैर-भक्ति मार्ग पर चलने वालों के सामने प्रकट नहीं होते। कोई भी जो क्रोधित या ईर्ष्यालु है वह उसे नहीं देख सकता;' और श्रीमद भागवतम में कहा गया है: 'पहलवानों को कृष्ण वज्र की तरह दिखाई दिए।' ये निर्णायक कथन इस बात की पुष्टि करते हैं कि राक्षसों के सामने परमप्रभु द्वारा प्रकट किया गया रूप उनका मूल रूप नहीं है, बल्कि एक भ्रामक रूप है। यदि कोई प्रभु के मूल रूप को देखता है, तो उसकी ईर्ष्यालु प्रकृति नष्ट हो जाती है। इसलिए, पृथ्वी के भार को कम करने के लिए, परमेश्वर ने केवल उस रूप को त्याग दिया जिसके द्वारा उन्होंने राक्षसों का नाश किया। वह उस रूप में फिर कभी प्रकट नहीं हुए। भक्ति के माध्यम से देखे जाने वाले प्रभु का रूप नित्य-सिद्ध, शाश्वत रूप से परिपूर्ण है। इसलिए अजा शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसलिए एक अभिनेता या जादूगर के रूप में, मछली खाने वाली क्रेन को मारने के लिए मछली के रूप में तैयार होकर, लोगों के मन में यह धारणा बनाने के लिए कि वह एक मछली है, और जैसे ही क्रेन मर जाती है, वह तुरंत मछली के अस्थायी रूप को छोड़ देता है; इसी तरह, यद्यपि भगवान कृष्णचंद्र अजा हैं (साधारण जीवित संस्थाओं की तरह जन्म से रहित), उन्होंने भौतिकवादियों की सांसारिक दृष्टि के सामने प्रकट अपने भ्रामक रूप से पृथ्वी के बोझ को कम करने के लिए राक्षसों को मार डाला। इन राक्षसों को मारने के बाद, उन्होंने (अजन्मे भगवान) भी अपना सांसारिक भ्रामक रूप छोड़ दिया। लेकिन भगवद्-गीता (7.25) के पहले उल्लेखित कथन, योगमाया-समावृतः, का वास्तव में अर्थ है 'उनका शरीर भ्रामक ऊर्जा के प्रतिबिंब से ढका है जैसे सांप अपनी त्वचा से ढका होता है।'
“इस स्थान पर, प्रभु का (पृथ्वी छोड़ने का) खेल उनके स्वयं के रूप द्वारा किया गया था (दूसरे शब्दों में, तीसरे या उपकरणात्मक मामले में शब्द स्वतंत्र - "उनका शरीर" का उपयोग किया गया है), उन्होंने अपने स्वयं के रूप से पृथ्वी नहीं छोड़ी (दूसरे शब्दों में, शब्द स्वतंत्र का तीसरा मामला इसका मतलब सह, या "साथ" नहीं है)। यह उचित स्पष्टीकरण है; चूँकि सह शब्द मूल श्लोक में नहीं पाया जाता है, यदि कोई अनावश्यक रूप से दीर्घवृत्त की आपूर्ति करता है (जो सुसंगत अर्थ को नष्ट कर देगा), तो दीर्घवृत्तीय शब्द को प्रमुखता दी जाएगी। विशेष रूप से, नामांकित, वस्तुगत और वाद्य जैसे मामले सह जैसे द्वितीयक शब्दों का उपयोग करके यौगिक शब्द बनाने की तुलना में अधिक विशिष्ट होते हैं। यह व्याकरणिक तर्क इस संबंध में प्रमाण भी है।" (क्रम-संदर्भ 106)
यादवों और अन्य क्षत्रियों की दयनीय मृत्यु के बारे में सुनकर मायूस हो चुके शौनकादि ऋषियों को सांत्वना देने के लिए श्री सूत गोस्वामी ने इन दो श्लोकों में गोपनीय निष्कर्ष सुनाए। जिस प्रकार काँटे को काँटे से ही निकाला जाता है, उसी तरह भगवान ने केवल यादव स्वरूप को त्याग दिया, जिससे उन्होंने पृथ्वी के बोझ को कम किया, जो उनकी एक-चौथाई संपदा का हिस्सा है। जिस तरह देवदत्त अपने खुद के वस्त्र त्याग देता है, उसी तरह भगवान ने अपना यादव रूप अपने संघ से अलग कर दिया। लेकिन भगवान ने वह रूप नहीं त्यागा जिसके साथ वे अनंत काल तक लीलाओं का आनंद उठाते हैं। इसलिए जब इस दुनिया में भगवान प्रकट हुए थे, तो जो देवता नित्य मुक्त यादवों के बीच प्रवेश कर गए थे, उन्हें भगवान ने यादवों से अलग करके प्रभास भेज दिया। बाद में, अपनी मायावी शक्ति की ताकत से, भगवान ने लोगों की आंखों के सामने उनकी मृत्यु का नाटक किया और उसके बाद उन्हें शहद पिलाकर देवताओं में बदल दिया और उन्हें स्वर्ग भेज दिया। यह व्याख्या श्रीमद् भागवतम के ग्यारहवें स्कंध के अंतिम भाग में मिलती है। कृष्ण की लीलाओं में शाश्वत सहयोगी जो यादव हैं, वे भौतिकवादी लोगों से छिपे रहे और द्वारका में कृष्ण के साथ उसी तरह क्रीड़ा करते रहे जैसे उनके पिछले अव्यक्त लीलाओं में। इस निष्कर्ष को श्री बृहद-भागवतामृत से जाना जाना चाहिए। 'पृथ्वी पर बोझ डालने वालों के शरीर' और 'यादवों के शरीर' का अर्थ है पृथ्वी पर बोझ डालने वाले राक्षसों के शरीर और उन देवताओं के शरीर जो यादवों और अन्य लोगों के रूप में प्रकट हुए - ये दोनों ही परम प्रभु के समान थे। लेकिन यद्यपि कांटों के वर्तमान उदाहरण में, दोनों समान हैं, बाहर निकालने वाला काँटा (जिसके द्वारा अंतर्निहित काँटा निकाला जाता है) कारण-भूत है, या वाद्य है, और इसलिए लाभकारी है और 'अंतरंग, या अंतरंग (और तुलनात्मक रूप से अधिक सुपाच्य) के रूप में जाना जाता है, जबकि कर्म-भूत, या सक्रिय काँटा (चूंकि यह अंतर्निहित है, इसलिए इसे निकाला जाना है) लाभहीन है और बहिरंग, या प्रतिकूल (और तुलनात्मक रूप से घृणित) के रूप में जाना जाता है।
यह श्लोक यह बताता है कि भगवान कृष्ण ने जादूगर की तरह अपनी झूठी देह त्यागने का नाटक करके, कैसे कुछ कल्पनाएँ रचीं। भावार्थ यह है कि सर्वोच्च प्रभु एक स्वरूप को स्वीकार करते हैं (प्रकट करते हैं) और उस स्वरूप को त्यागते हैं (अप्रकट करते हैं) (दूसरे शब्दों में, वे केवल अपने शरीर को त्यागने का नाटक करते हैं)। लेकिन एक रूप को स्वीकार करने के बाद, वे उसे नहीं छोड़ते- इससे यह समझना चाहिए कि जब प्रभु अपने रूप को त्याग देते हैं (अप्रकट करते हैं) तो वही रूप पारलौकिक क्षेत्र में मौजूद रहता है। अगर कोई पूछे, 'यह कैसे समझा जा सकता है?' उत्तर यहाँ दिया गया है। जिस प्रकार एक जादूगर लोगों को यह भ्रम देता है कि उसने अपने शरीर को काटकर, उसे जलाकर, या बेहोश होकर त्याग दिया है, जबकि वह वास्तव में अपने शरीर में ही रहता है और मरता नहीं है, उसी प्रकार, सर्वोच्च प्रभु मत्स्य जैसे शरीरों को स्वीकार करते हैं और उन्हें त्याग भी देते हैं, दूसरे शब्दों में, वे उन्हें स्वीकार करते हैं और केवल उन्हें त्यागने का दिखावा करते हैं। इसलिए, जिस प्रकार एक जादूगर का अपने शरीर के साथ रहना वास्तविक है, वैसे ही उसका उस शरीर को त्यागना भ्रामक है। इसी प्रकार, प्रभु का मत्स्य जैसे शरीरों को स्वीकार करना वास्तव में सत्य है, और उनका ऐसे शरीरों को त्यागना वास्तव में भ्रामक है। यही भावार्थ है। जिस प्रकार प्रभु अपने अन्य आकस्मिक शरीरों जैसे मत्स्य को त्याग देते हैं, उन्होंने केवल उस सांसारिक रूप को त्याग दिया जिसके द्वारा उन्होंने पृथ्वी का बोझ कम किया। इसलिए चूँकि भगवान कृष्ण के रूपों को त्यागने की पूरी घटना भ्रामक और झूठी है, एक मानव के रूप में सर्वोच्च ब्रह्म बनकर, वे केवल साधारण मनुष्यों जैसे शरीरों को त्यागने का अनुकरण करते हैं। फिर भी वास्तव में वे ऐसा नहीं करते हैं, क्योंकि उनके रूप का पारलौकिक (भौतिक तत्वों से परे) होना, उनके शरीर के नष्ट होने की कोई संभावना नहीं है। जैसा कि महाभारत में कहा गया है: 'पाँच स्थूल भौतिक तत्व कृष्ण के शरीर में नहीं हैं, जो परमात्मा हैं।' बृहत्-विष्णु पुराण भी कहता है: 'वेदों और स्मृतियों के आदेशों के अनुसार, जो यह मानता है कि कृष्ण का शरीर भौतिक तत्वों से बना है, उसे अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। अगर कोई ऐसा व्यक्ति दिखे, तो उसे कपड़े पहने हुए स्नान करना चाहिए।' ऋषि वैशाम्पायन द्वारा बोले गए विष्णु-सहस्र-नाम में कहा गया है: 'अमृत या अमरत्व, केवल उसी का एक भाग है, क्योंकि वह अमरता का अवतार है।' शंकराचार्य की इस पर टिप्पणी-'जिसका शरीर अमृत (अमर) है' - प्रभु के शरीर और आत्मा के बीच अंतर बताती है, लोकप्रिय नहीं है। इस श्लोक [भागवत 1.15.34] का तात्पर्य यह है कि 'त्यागने' को इंगित करने के लिए शब्द जह्यात की क्रिया ह का प्रयोग किया जाता है, और त्याग करने का कार्य पुरस्कृत करने के उद्देश्य के लिए किया जाता है। वैकुंठ के भक्तों का पालन-पोषण करने के लिए, भगवान कृष्ण ने उन्हें नारायण के रूप में अपना रूप दिया, जो पहले ही उनमें विलीन हो चुके थे। इसका विस्तृत वर्णन श्रीमद् भागवतम के ग्यारहवें कांड के अंत में किया जाएगा।
"इस श्लोक को कृष्ण के अपने शरीर को त्यागने की अवास्तविकता का वर्णन करने के लिए उद्धृत किया गया है, दूसरे शब्दों में, इसकी झूठ को स्पष्ट रूप से समझाने के लिए। इस संबंध में श्रीधर स्वामी की टीका और श्री जीवपाद की संदर्भ टीका पर चर्चा करनी चाहिए।" (श्री विश्वनाथ)
श्रीमद् भागवतम (3.2.11) में विदुर को श्री उद्धव के शब्दों पर टीकाएँ: ādāyāntar adhād yas tu sva-bimbaṁ loka-locanam--"उन्होंने जन दृष्टि से अपना रूप हटाकर अपना अंतर्धान किया," इस प्रकार हैं।
"इस बिंदु तक अपना रूप प्रदर्शित करने के बाद, प्रभु जन दृष्टि से अंतर्धान हो गए, क्योंकि दृष्टि का कोई अन्य योग्य उद्देश्य नहीं था।" (श्रीधर स्वामी)
"वैदिक कथन के अनुसार, 'वह आँखों की दृष्टि है,' प्रभु ने लोगों की दृष्टि को अपने स्व-बिम्बम-अपने स्वयं के रूप से छोड़ दिया। इसका वर्णन महाभारत, मौशल-पर्व में भी किया गया है:
kṛtvā bhārāvataraṇaṁ pṛthivyāḥ pṛthu-locanaḥ
mocayitvā tanūṁ kṛṣṇaḥ prāptaḥ svasthānam uttamam
'लोगों की नज़र में, पृथ्वी के बोझ को कम करने के बाद, कृष्ण ने अपना रूप छोड़ दिया और अपने सर्वोच्च निवास स्थान पर वापस चले गए।' इस श्लोक में शब्द मोचयित्वा, या 'छोड़कर', यह संकेत देता है कि उन्होंने पृथ्वी के बोझ को कम करने की गतिविधियों से अपने रूप को अलग कर लिया, दूसरे शब्दों में, उन्होंने अपने रूप को ऐसे सगाई से आराम की अनुमति दी। इस शब्द का उपयोग पृथ्वी के बोझ को कम करने की गतिविधियों से पूर्ण स्वतंत्रता को इंगित करने के लिए नहीं किया गया है.' (क्रम-संदर्भ)
शब्द स्व-बिंबम भगवान के सच्चिदानंद रूप और उनकी प्रतिकृति को संदर्भित करता है। शब्द तु वैदिक कथन की पुष्टि करता है द्वे बाबा ब्रह्मणो रूपे- 'परम ब्रह्म के दो रूप हैं।' (श्री विजयध्वज)
यह श्लोक कहता है कि भगवान ने लोगों की आँखों के सामने अपना स्वरूप प्रकट किया और फिर उसी रूप के साथ गायब हो गए। इस कथन से, जो व्यक्ति इस बात की वकालत करते हैं कि सर्वोच्च भगवान अपने शरीर को प्रतिकूल आपत्तियों से छोड़ देते हैं जैसे 'भगवान कृष्ण ने अपना शरीर छोड़ दिया और गायब हो गए' हार गए हैं। चूँकि अगले कुछ श्लोकों में उपयोग किए गए विशेषण भगवान के शरीर का वर्णन करते हैं जब उन्होंने अपना मानवीय रूप छोड़ दिया और युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में एक दिव्य रूप में गए, जो लोग इस तथ्य का विरोध करते हैं कि कृष्ण के पास मानवीय रूप है, वे भी हार गए हैं। इसके अलावा, कथन 'वे अपने स्वरूप को प्रकट करते हैं और उसी रूप के साथ गायब हो जाते हैं,' से यह समझा जाता है कि प्रकट होने और गायब होने के उनके मनोरंजन उनकी सर्वोच्च इच्छा का परिणाम हैं। इसलिए जो लोग इस बात की वकालत करते हैं कि सर्वोच्च भगवान कर्म के नियंत्रण में हैं (जो लोग मानते हैं कि सर्वोच्च भगवान जन्म के नियंत्रण में हैं और सामान्य जीवित संस्थाओं की तरह मरने जैसी गतिविधियां हैं) हार गए हैं। (श्री विश्वनाथ)
श्रीमद्भागवतम पर अपने भगवत-तात्पर्य सारांश में (३.२.१३), श्री माधवाचार्य स्कंद पुराण से निम्नलिखित श्लोक उद्धृत करते हैं: 'हाय अरे, माया के घेराबंदी के भ्रम से कितने भ्रमित हैं जो विष्णु के सच्चिदानंद रूप को भौतिक मानते हैं!'
श्रीमद भागवतम (३.४.२८-२९) में श्री शुकदेव गोस्वामी महाराजा परीक्षित से कहते हैं: हरि अपि ता त्याज आकृतिं त्रयाधीशः-'श्री कृष्ण, तीनों लोकों के भगवान ने पृथ्वी पर अपने मनोरंजन पूरे किए' और त्याक्ष्यन देहम् अचिन्तयत-'उन्होंने खुद के बारे में पृथ्वी के चेहरे से गायब होने के बारे में सोचा।' इन श्लोकों को इस प्रकार समझाया गया है।
'आकृति' शब्द का अर्थ है 'पृथ्वी', क्योंकि शब्दकोशों के अनुसार शब्द शरीर, आकृति, देह, कु, पृथ्वी और माही सभी के समान अर्थ हैं। स्कंद पुराण कहता है कि वाक्यांश 'भगवान हरि ने अपना शरीर त्याग दिया'का अर्थ है'उन्होंने पृथ्वी को छोड़ दिया।' चूँकि वह शाश्वत आनंद की पहचान है, कोई अन्य अर्थ नहीं हो सकता। यद्यपि सर्वोच्च भगवान विष्णु ज्ञान की पहचान हैं, एक अभिनेता की तरह वे भौतिकवादियों को चकित करने के लिए खुद के समान एक मृत रूप या मृत शरीर का प्रदर्शन करते हैं।(श्री माधवाचार्य का भागवत-तात्पर्य)
'आकृति' शब्द का अर्थ है 'पृथ्वी', और देह शब्द का अर्थ भी 'पृथ्वी' है। क्योंकि वैदिक कथन यस्य पृथ्वी शरीरम-' जिसका शरीर पृथ्वी है' इसका प्रमाण है। (श्री विजयध्वज)
आकृति शब्द का अर्थ है 'मानव रूप की तरह'। (श्रीधर स्वामीपाद)
निधन शब्द कृष्ण के शाश्वत निवास को संदर्भित करता है, जो सबसे बड़ा धन है। दो कथनों के अनुसार: मृत्य-लोकं जिहासत- 'प्रभु द्वारा, जो नश्वर दुनिया को छोड़ना चाहते थे', पिछले श्लोक 26 में, और असमा लोकाद उपरते-'जब प्रभु इस सांसारिक दुनिया की दृष्टि छोड़ते हैं', श्लोक 30 का, आकृति शब्द का अर्थ है भगवान का सार्वभौमिक रूप। यदि कोई इस विषय के बारे में विशेष रूप से जिज्ञासु है, तो उसे श्री कृष्ण-संदर्भ, श्लोक 93 का अध्ययन करना चाहिए।' (क्रम-संदर्भ)
इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि भगवान हरि ने आ (पूरी तरह से) + कृति (भौतिक दुनिया में गतिविधियों और लीलाओं) का त्याग कर दिया; दूसरे शब्दों में, उन्होंने ‘समाप्त’ कर दिया। त्याक्ष्यन् (क्योंकि त्याज क्रिया का प्रयोग देने के अर्थ में किया जाता है) शब्द इस बात की ओर इशारा करता है कि भगवान कृष्ण की इच्छा ब्रह्मा के नेतृत्व में अपने भक्तों को अपना पूर्ण अंश नारायण को वैकुंठ भेजकर भरण पोषण देने की थी। अपने सन्दर्भ में, श्री जीवपाद कहते हैं कि देह शब्द पृथ्वी को दर्शाता है जो ईश्वर का सार्वभौमिक रूप है। (श्री विश्वनाथ)
श्रीमद् भागवतम् (11.30.2) में श्री परीक्षित श्री शुकदेव से इस प्रकार कहते हैं: तनुं स कथम त्यजत - "वह अपने शरीर का त्याग कैसे कर सके?" श्री माध्वाचार्य इस श्लोक के इस भाग की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि प्रभु ने अपने रूप को पूरी तरह से गायब कर दिया क्योंकि इस श्लोक में क्रिया अज का अर्थ "छीन लेना" है। दूसरे शब्दों में, भगवान ने अपना रूप छीन लिया या पृथ्वी से स्वर्ग (गोलोक-धाम) को गायब कर दिया।
श्रीमद् भागवतम् (11.30.40) में श्री शुकदेव श्री परीक्षित से इस प्रकार कहते हैं: इति आदिष्टो भगवता कृष्णेच्छा-शरीरिणा - "[शिकारी] को इस प्रकार परम भगवान कृष्ण द्वारा निर्देश दिया गया था जो अपनी इच्छा से अपना पारलौकिक शरीर धारण करते हैं।" श्लोक के इस भाग की टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं।
"भगवान ने अपने रूप को गायब कर दिया, जो शुद्ध अच्छाई का व्यक्तित्व है, और केवल अपने रूप की एक प्रतिकृति को पीछे छोड़कर नश्वर प्राणियों की नकल की। भगवान द्वारा नकल का कार्य बाद में श्रीमद् भागवतम् (11.31.8) में स्पष्ट रूप से देखा जाएगा, जिसमें शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज से इस प्रकार कहते हैं: 'ब्रह्मा के नेतृत्व में अधिकांश देवता और अन्य उच्च प्राणी भगवान कृष्ण को उनके अपने निवास में प्रवेश करते हुए नहीं देख सके, क्योंकि उन्होंने अपने आंदोलनों को प्रकट नहीं किया। लेकिन उनमें से कुछ ने उन्हें देखा, और वे बेहद चकित थे।'" (श्रीधर स्वामीपाद)
"वाक्यांश इच्छा-शरीरिणा का अर्थ है 'जिसका शरीर केवल अपनी इच्छा से प्रकट होता है,' दूसरे शब्दों में, उनकी उपस्थिति (और गायब होना) उनकी अकल्पनीय सर्वोच्च इच्छा से प्रकट होती है। इस संबंध में किसी अन्य कारण के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं है।" (क्रम-संधर्भ)
"वाक्यांश इच्छा-शरीरिणा का अर्थ है 'जो अपनी इच्छा से एक पारलौकिक शरीर स्वीकार करते हैं, जिसकी हर कोई महिमा करता है।'" (श्री विश्वनाथ)
श्रीमद् भागवतम् (11.30.49) में परम भगवान अपने सारथी दारुक से इस प्रकार कहते हैं: मन-माया-रचितम एतं विज्ञयोपशमं व्रज - "इन लीलाओं को मेरी भ्रामक शक्ति के प्रदर्शन के रूप में समझकर, आपको शांत रहना चाहिए।" इस श्लोक की व्याख्या इस प्रकार है।
"दारुक को सांत्वना देने के लिए, प्रभु इस श्लोक में बताते हैं कि उनका शरीर त्यागने का लीला उनकी भ्रामक ऊर्जा की शक्ति द्वारा बनाया गया एक जादू की तरह है। 'जानो कि मेरी हाल की गतिविधियाँ जैसे यादव वंश का विनाश और मेरे शरीर का त्याग, जो सामान्य लोगों की आँखों के सामने प्रकट थे, मेरी भ्रामक ऊर्जा द्वारा बनाए गए जादू के कार्य की तरह हैं; इस प्रकार आपको उदासीन रहना चाहिए। ऊपर दिए गए श्लोक के पहले भाग में [तु] शब्द का अर्थ है 'जो लोग मुझसे विमुख हैं उन्हें भ्रमित रहने दो, लेकिन आपको भ्रमित होना उचित नहीं है।'" (क्रम-संधर्भ)
श्रीमद् भागवतम् (11.31.6) में श्री शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज से इस प्रकार कहते हैं:
लोकभिरामां स्व-तनुं धारणा-ध्यान-मंगलम
योग-धारणायग्नेया- दग्ध्वा धामाविशत् स्वकम्
"अपने पारलौकिक शरीर को जलाने के लिए रहस्यमय अग्नेयी ध्यान को नियोजित किए बिना, जो सभी दुनियाओं का सर्व-आकर्षक विश्राम स्थल है और सभी चिंतन और ध्यान का उद्देश्य है, भगवान कृष्ण अपने निवास में प्रवेश कर गए।" इस श्लोक की टीकाएँ इस प्रकार हैं।
"प्रभु अपने शरीर को आग से बिना जलाए ही अपने धाम में प्रवेश कर गए | तंत्र-भागवत में कहा गया है : 'अन्य सभी देवता अपने शरीर को अग्नि मेडिटेशन के ज़रिए जलाकर अपने सर्वोच्च गंतव्य तक पहुंचते हैं, लेकिन सर्वोच्च भगवान हरि, जिनकी कृष्ण और नृसिंह के रूप में विविध आकृतियाँ हैं, वे शाश्वत रूप से आनंदमय हैं, इसलिए वे अपने शरीर को जलाए बिना ही अपने धाम में प्रवेश करते हैं | वे देवताओं के सूक्ष्म शरीरों को नष्ट कर देते हैं और संहार के समय उनके बीच में नृत्य करते हैं | "(श्री माध्वाचार्य का भागवत-तात्पर्य)
"योगी जो (इच्छा से) 'मर सकते हैं' वे अपने शरीर को अग्नि योग मेडिटेशन की आग से जला देते हैं और अन्य ग्रहों में प्रवेश करते हैं, लेकिन सर्वोच्च भगवान कृष्ण के साथ ऐसा नहीं है | वे अपनी उसी आकृति के साथ, उसे जलाए बिना अपने धाम, बैकुंठ में प्रवेश कर गए | इसका कारण यह है कि सभी ग्रह उनके शरीर के अंगों में पूरी तरह से मौजूद हैं, इसलिए यदि उनका शरीर, जो आश्रय की दुनिया है, जल जाता है, तो दुनिया भी जल जाएगी | अब तक यह देखा गया है कि प्रभु के भक्तों द्वारा प्रभु से मिलना और मिलने के फलों को प्राप्त करना केवल मेडिटेशन की प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त होता है | यदि सर्वोच्च भगवान ने अपनी आकृति को जला दिया था, तो उनकी आकृति के लिए लोकभीरामां- 'सभी दुनियाँ के लिए आकर्षक' जैसे विशेषण अर्थहीन हो जाते, इसलिए वे अपनी आकृति को जलाए बिना ही गायब हो गए | यह उचित अर्थ है | "(श्रीधर स्वामी)
"यदि किसी कथन के एक शब्द का कोई अन्य अर्थ है, तो ब्रह्म-सूत्र (1.1.22) से तर्क के अनुसार, आकाशस तल्लिंगात-'सर्वोच्च ब्रह्म सभी जीवित प्राणियों और पाँच स्थूल भौतिक तत्वों का सामूहिक घटक है," केवल कथन का सिद्धांत निर्देशात्मक अर्थ स्वीकार किया जाता है | इसलिए दगध्वा या "जलने" शब्द से जो अर्थ निकलता है, वह लोकभीरामां जैसे शब्दों से वश में कर लिया जाता है, जो अदगध्वा या "न जलने" अर्थ प्रकट करते हैं, 2 लोकभीरामां शब्द यह बताता है कि भगवान की आकृति पूरी दुनिया का आश्रय है | लोका शब्द से, महा-वैकुण्ठ के शाश्वत सहयोगी और भक्त और आत्मारामा-ज्ञानी, आत्म-संतुष्ट पारलौकिकवादियों से शुरू होने वाले सभी चेतन जीवित प्राणियों को इंगित किया गया है | इसके अलावा, धारणा-ध्यान-मंगलम शब्द इंगित करते हैं कि भगवान की आकृति आध्यात्मिक प्रथाओं में लगे लोगों का आश्रय है | ध्यान में लगे व्यक्तियों के लिए जो शुभ है, वह अन्यथा कैसे हो सकता है (जलने के कारण नष्ट हो जाने के कारण घृणित)? स्व-तनुं शब्द से, जो कर्म-धारा-समासा, एक विरोधी यौगिक है, प्रभु के स्वरूप (नीले कमल की नीलिमा) में संवैधानिक गुणों के अनुरूप होने की पुष्टि की गई है |
"इसके बाद, योगियों की भ्रांतियों का खंडन करने के लिए, यह कहा गया है कि यद्यपि यह सच है कि प्रभु अग्नि मेडिटेशन में लीन थे, फिर भी उन्होंने अग्नि मेडिटेशन से अपने शरीर को जलाए बिना अपने धाम में प्रवेश किया | इसलिए योगियों को अपना शरीर त्यागने का तरीका सिखाने के लिए, प्रभु ने पहले अग्नि मेडिटेशन में भाग लिया और फिर अपने स्वयं के रूप को गायब कर दिया | यह इस श्लोक का आशय है; कोई अन्य अर्थ उपयुक्त नहीं है | इसलिए 'अपने स्वयं के रूप को बिना जलाए' कथन का अर्थ है 'उन्होंने एक आकृति को जला दिया जो उनकी स्वतंत्र भ्रामक ऊर्जा द्वारा बनाई गई थी |' यही कारण है कि श्रीमद भागवतम (11.30.40) के पहले उद्धृत श्लोक में कहा गया है कि सर्वोच्च भगवान अपनी सर्वोच्च इच्छा से अपने रूप को प्रकट करते हैं | एक वस्तु जो स्वतंत्र रूप से प्रकट होती है, उसे स्वतंत्र रूप से गायब भी हो जाना चाहिए | इसलिए अग्नि मेडिटेशन में उनका शामिल होना भी भ्रामक है | कृष्ण-संदर्भ में, इच्छा-शरीरी, 'जो अपनी इच्छा के अनुसार शरीर धारण करता है' वाक्यांश को सवेच्छा-प्रकाश, 'अपनी इच्छा से प्रकट,' या 'किसी की इच्छा का शरीर' के रूप में समझाया गया है, जिसके द्वारा वह अपनी इच्छा अनुसार कार्य करता है | यह व्याख्या भी संभव है | उस स्थिति में यह समझना होगा कि केवल उनकी सर्वोच्च इच्छा से ही वह उस भ्रम के प्रवर्तक थे | यह व्याख्या भी उचित है | "(क्रम-संदर्भ)
"प्रभु, उन योगियों से भिन्न हैं जो अपनी मृत्यु को नियंत्रित करने में सक्षम हैं, अपनी आगनेयी ध्यान के द्वारा अपने शरीर को जलाए बिना, वे अपने निवास, वैकुंठ में प्रवेश किए। और शब्द 'अदग्ध्वा,', 'जले बिना,' इंगित करता है कि उनका रूप लोगों की आँखों के लिए बहुत मनभावन है, दूसरे शब्दों में, यह ध्यान का विषय है। दोनों व्याख्याओं का वर्णन इस श्लोक में किया गया है।" (श्रीधरा स्वामीपाद)
"कुछ विद्वान वाक्यांश धारणा-ध्यान-मंगल की व्याख्या 'प्रभु ने अपने शरीर को जलाया और उस आग से शुद्ध जम्बू नदी के समान अधिक चमकते रूप के साथ निकले और फिर अपने निवास में प्रवेश किया' के रूप में करते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रभु ने उन लोगों को दिखाया जो संदेह करते हैं और उनकी अवधारणा का विरोध करते हैं कि उनका रूप आध्यात्मिक है, उनका रूप उनके शरीर की आग से भी नहीं जलाया जा सकता।" (श्री विश्वनाथ)
श्रीमद भागवतम (11.31.11-13) में श्री परिक्षित के लिए श्री शुकदेव के कथन पर टिप्पणियाँ निम्नलिखित हैं:
"तुम्हें समझना चाहिए कि सभी कारणों के कारण, सर्वोच्च भगवान श्री कृष्ण द्वारा नश्वर प्राणियों के बीच प्रकट होने और विलुप्त होने, एक अभिनेता के प्रदर्शन की तरह, उनकी भ्रामक ऊर्जा द्वारा बनाए गए शो हैं। इस ब्रह्मांड को बनाने के बाद, वे इसमें अतिआत्मा के रूप में प्रवेश करते हैं, और इस भौतिक दुनिया के मनोरंजन से खुद को अलग करने के बाद, वे इसे समाप्त कर देते हैं। अपनी स्वयं की पारलौकिक महिमा के प्रभाव से, भगवान अपने शाश्वत अप्रकट साम्राज्य में स्थित रहते हैं। इसके अलावा, किसी को दूसरा अर्थ स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनके वर्तमान अवतार में विभिन्न ऐश्वर्य का प्रदर्शन किया गया है। यदि कोई पूछता है, 'यदि प्रभु खुद को बचाने में सक्षम थे तो वे एक पल के लिए भी अपने शरीर में क्यों नहीं रहे?' इसका उत्तर देते हुए कहा गया है: यद्यपि प्रभु असीमित रूप से शक्तिशाली हैं और असंख्य ब्रह्मांडों के सृजन, रखरखाव और विनाश का एकमात्र कारण हैं, यह सोचकर कि उनका सांसारिक नश्वर शरीर अब प्रभावी नहीं रहेगा और आत्म-साक्षात्कार आत्माओं के सर्वोच्च गंतव्य का प्रदर्शन करने के बाद, नश्वर यादवों की हत्या के बाद उन्होंने अपने शरीर को नहीं रखना चाहा, बल्कि इसे अपने निवास स्थान पर ले गए। अन्यथा, ऊपर उल्लिखित आत्म-साक्षात्कार आत्माएँ सर्वोच्च गंतव्य प्राप्त करने की अवहेलना करेंगी और योगिक पूर्णता प्राप्त करके इस भौतिक दुनिया में रहने का प्रयास करेंगी-ताकि यह आपदा न हो, दूसरे शब्दों में, इसे जांचने के लिए, प्रभु अपने विलुप्ति मनोरंजन का प्रदर्शन करते हैं।" (श्रीधरा स्वामीपाद)
"वाक्यांश तनु-भृज-जननाप्यय एहा [भाग. 11.31.11] का अर्थ है 'अवतारित जीवों के जन्म और मृत्यु के समान।' वेद कहते हैं: 'विष्णु, सभी जीवों के स्वामी, ब्रह्मांड के भीतर भटकते हैं। यद्यपि वे संकल्पित आत्माओं की तरह जन्म नहीं लेते, वे विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं।' ब्रह्म पुराण में कहा गया है: 'मूर्ख लोगों को अपनी भ्रामक ऊर्जा से भ्रमित करने के लिए, भगवान विष्णु एक जन्मजात जीव के रूप में प्रकट होते हैं यद्यपि जन्महीन हैं और एक मृत जीव के रूप में यद्यपि अमर हैं।' अन्यत्र कहा गया है: 'भगवान पुरुषोत्तम इस दुनिया के लोगों को भ्रमित करने के लिए अपने मानवीय प्रयासों का प्रदर्शन करते हैं। इसके अलावा, यद्यपि सर्वोच्च भगवान विष्णु व्यक्तिगत रूप से एक भौतिक शरीर को स्वीकार नहीं करते हैं, पापी लोगों को भ्रमित करने के लिए वे एक नश्वर प्राणी की तरह खुद को प्रकट करते हैं और अपनी अपनी भ्रामक ऊर्जा के माध्यम से वे प्रदर्शन के लिए एक मृत शरीर बनाते हैं। वास्तव में अतिआत्मा, भगवान हरि, अमर हैं, तो मृत शरीर कैसे हो सकता है?' ब्रह्मांड पुराण में कहा गया है: 'विभिन्न वैदिक कथन जो स्पष्ट रूप से जीवों को सर्वोच्च भगवान, भगवान विष्णु से भिन्न नहीं बताते हैं, एक साधारण जीव की तरह शरीर को स्वीकार करते हैं और त्यागते हैं, उनके कष्ट, उनके शरीर को उनके दुश्मनों के तीरो द्वारा काटना और भेदना, उनकी हार, और उनकी निर्भरता, दूसरे शब्दों में, दूसरों के नियंत्रण में रहना, सभी को पापी राक्षसों को भ्रमित करने के लिए कहा गया है। सबसे पहले भीष्मक की बेटी रुक्मिणी, और फिर सत्यभामा, जंगल में गायब हो गईं। दोनों के पास शुद्ध आध्यात्मिक शरीर हैं, इसलिए उन्होंने साधारण जीवों की तरह अपने शरीर को नहीं त्यागा।" (श्री माधवाचार्य भागवत-तत्वपर्य)
"यादवों की उत्पत्ति इस भौतिक संसार से नहीं हुई, तो राम और कृष्ण के बारे में क्या कहें। - इस निष्कर्ष को स्थापित करने के लिए, यह कहा जा रहा है कि यादवों द्वारा प्रकट होने और अंतर्धान हो जाने की क्रियाएं, जो भगवान के शाश्वत सहयोगी हैं और भगवान के समान शुद्ध रूपों के धारक हैं, कृष्ण की तरह ही भ्रामक हैं। ऐसी क्रियाएं ठीक एक जादूगर की तरह होती हैं जो अपने या दूसरों के शरीर को मार सकता है या जला सकता है और फिर उन्हें फिर से जीवित दिखा सकता है। अकल्पनीय सर्वव्यापी भगवान सार्वभौमिक सृष्टि का कारण है - उनके लिए इस तरह की पराक्रम की प्रदर्शनी बहुत अद्भुत नहीं है। इस प्रकार:
सीतयाराधितो वह्निश् छाया-सीताम अजीजनत्
तां जहारा दश-ग्रीवः सीता वह्नि-पुरं गता
परीक्षा-समये वह्निं छाया-सीता विवेश सा
वह्निः सीतां समानीय तत्-पुरास्ताद अनीनयत्
'जब माता सीता ने उनसे प्रार्थना की, अग्नि-देव, अग्नि, सीता का एक भ्रामक रूप लेकर आए, और रावण, जिसके दस सिर थे, उसने झूठी सीता का अपहरण कर लिया। असली सीता तब अग्नि-देव के निवास स्थान पर गई। जब भगवान रामचंद्र ने सीता के शरीर का परीक्षण किया, तो यह झूठी, भ्रामक सीता थी जो आग में प्रवेश कर गई। उस समय अग्नि-देव मूल सीता को अपने निवास से लाए और उन्हें भगवान रामचंद्र को सौंप दिया।' बृहद-अग्नि पुराण के इस कथन के अनुसार, भौतिकवादियों ने सीता, भाग्य की दिव्य देवी, और श्री संकर्षण जैसे व्यक्तित्वों के बारे में मूर्ख व्यक्तियों की गलतफहमियों के रावण के भ्रामक या झूठे मनोरंजन के उदाहरण को गलत तरीके से समझा है।
"जो यादव दिव्य आध्यात्मिक शरीर रखते हैं, उनके बारे में क्या कहना है, कृष्ण द्वारा बनाए गए अन्य विभिन्न व्यक्तियों को भी मृत्यु के अधीन नहीं किया जाता है। क्या कृष्ण अपने स्वयं के सहयोगियों, यादवों की रक्षा करने में असमर्थ थे? इसलिए यादवों की गतिविधियाँ (जैसे कि उनके शरीर छोड़ना) वास्तविक मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह स्वीकार करना सबसे उचित है कि वे अपने शरीर में गोलोक लौट गए।
"यदि कोई तर्क देता है कि यादव अपने शरीर में ईश्वर के पास वापस चले गए, लेकिन चूंकि भगवान उपस्थित थे, इसलिए उन्हें उनसे अलग होने से कोई तकलीफ नहीं हुई; लेकिन अगर भगवान अपने लोगों की रक्षा करने में सक्षम थे, तो उन्होंने यादवों की तरह अन्य सहयोगियों का आगमन क्यों नहीं किया और जीवित प्राणियों के लाभ के लिए इस दुनिया में उनके साथ कुछ समय तक क्यों नहीं रहे? इस श्लोक में दिया गया निर्णायक उत्तर यह है कि भगवान और यादवों दोनों का एक-दूसरे के लिए अबाध स्नेह है। यद्यपि भगवान असीम रूप से शक्तिशाली हैं, यादवों के अंतर्धान होने के बाद, उन्होंने सोचा, 'यादवों के बिना इस संसार में मेरे रहने की क्या आवश्यकता है?' इसे ध्यान में रखते हुए, भगवान ने खुलासा किया कि उनका गंतव्य वही था जो यादवों ने प्राप्त किया था, जो भगवान के निवास स्थान पर वापस आ गए थे, और इस प्रकार उन्होंने अब इस दुनिया में एक क्षण के लिए भी अपना रूप धारण नहीं रखना चाहा, इसलिए वे इसे अपने निवास स्थान पर ले गए।"(क्रम-संदर्भ)
"श्री शुकदेव ने परीक्षित महाराज को श्री हरि के इस लोक से अंतर्धान हो जाने से दुखी देखकर उन्हें प्रभु की लीलाओं के निश्चित तत्वों का वर्णन किया। यह जानना चाहिए कि भगवान की जन्म और मृत्यु आदि क्रियाएं मनुष्यों की तरह मायाकृत मात्र हैं। वे वास्तविक नहीं हैं। वीर्य और रक्त से निर्मित शरीर वाले जीवों का जन्म-मृत्यु सुख-दुख से पूर्ण होता है, किंतु अध्यात्मिक शरीर वाले भगवान का प्रकट और अंतर्धान होना पूर्ण आध्यात्मिक सुखमय है। ब्रह्मांड पुराण में कहा गया है: 'भगवान हरि का यह स्वरूप लोकिक राग-द्वेष से रहित है, फिर भी उनके चरितों में आने वाले ग्रहण और त्याग शब्दों का तात्पर्य उनके प्रकट और अंतर्धान होना ही जानना चाहिए'। यह एक जादूगर के खेल की भांति होता है जो जीवित रहते हुए भी स्वयं और दूसरों के लिए काल्पनिक जन्म-मृत्यु का खेल दिखलाता है। ऋषियों के शाप के कारण ही भगवान ने पहले परिवार में भेद, क्लेश और शास्त्र-शस्त्र युक्त घोर विग्रह कराकर यदुकुल में अवतार लिया। तब उन्होंने मृत्युलोक के यदुवंशियों को अपने लोकों में मिलाकर बेंत और शस्त्र धारण किया। कुछ समय तक उनके साथ खेलकूद करते हुए मायाबल से परे रहते हुए सबको मार डाला।
"भगवान सर्वसमर्थ और परम ऐश्वर्यवान होते हुए भी यदुकुल में सम्मिलित हुए देवताओं को स्वर्ग भेजकर, न तो अपने शरीर और न ही यदुकुल वालों के शरीरों को यहाँ रखने की इच्छा करते हैं, क्योंकि लोक में इनकी आवश्यकता नहीं है। दूसरे शब्दों में, भगवान को लोक की अपेक्षा नहीं है, किंतु अपने धाम गोलोक की है। जिस तरह ब्रह्मा आदि देवताओं की प्रार्थना से भगवान इस लोक में अवतरित हुए थे, उन्हीं की प्रार्थना से उन्होंने ब्रह्मा आदि देवताओं को वैकुंठ जाने का दर्शन कराया। इस श्लोक में भी यही बात कही गई है। इस प्रकार के विरुद्ध भाव से यदि कोई व्याख्या की जाए तो वह श्रीमद्भागवत (३।२।११) में उद्धव के वचनों के भी विरुद्ध होगी और भक्तों को भी अरुचिकर होगी। ऐसा विरुद्ध व्याख्यान, जैसा कि राक्षसों का है भक्तों को अरुचिकर है। इसे उद्धव ने स्वयं पिछले श्लोक (३।२।१०) में कहा है कि 'भगवान की माया से मोहित होकर यदुकुलवासी मृत्युधर्मा होकर भी शिशुपाल की तरह भगवान की निंदा कर रहे हैं। मेरी बुद्धि कृष्णमुखी हो, वह इस तरह के निंदा वाद से कभी मोहित न हो'। अर्थात् जो लोग इस तरह के निंदावचन से मोहित होते हैं, वे माया के ही मोहपाश में फँसे हुए हैं।" (श्री विश्वनाथ)
महाभारत (2.79-83) पर अपनी टीका में श्री माधवाचार्य ने कहा है: "कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि भगवान विष्णु एक साधारण जीव की तरह जन्म लेते हैं, तो उनकी मृत्यु का प्रश्न ही कहाँ उठता है? उन्हें किसी के द्वारा नहीं मारा जा सकता या चकमा नहीं दिया जा सकता है। स्वतंत्र रूप से सर्वोच्च भगवान के लिए दुख का सवाल ही कहाँ रहता है, जो अनंत आनंद से भरे हुए हैं? यद्यपि सर्वोच्च भगवान हरि का पूरे ब्रह्मांड पर अधिकार है, फिर भी वह अपने अनंत कालिक मनोरंजन में खुद को एक साधारण किसान की तरह कमजोर प्रदर्शित करते हैं। लेकिन यद्यपि अपने मनोरंजन के दौरान वह कभी-कभी अपनी पहचान भूल जाते हैं, वह कभी-कभी एक पति की तरह अलगाव के संकट को झेलते हुए सीता की तलाश करते हैं, और कभी-कभी इंद्रजीत की रस्सियों से बंधे होते हैं, यह जानना होगा कि ये मनोरंजन केवल राक्षसों को चकमा देने के लिए होते हैं। राक्षसों के तीरों से चकमा खाने, अपने खुले घाव से खून पोंछने, एक अज्ञानी व्यक्ति की तरह दूसरों से पूछताछ करने और अपने शरीर को त्यागकर स्वर्ग जाने जैसे उनके मनोरंजन एक अभिनेता के नाटक की तरह हैं बस राक्षसों को चकमा देने के लिए। हालाँकि, भक्त इन मनोरंजनों को भ्रामक मानते हैं, दूसरे शब्दों में, उनका मानना है कि ये मनोरंजन केवल झूठे छल हैं। भगवान श्री हरि के प्रकटन और विलोपन मनोरंजन साधारण रूप से सन्निहित जीवों की तरह नहीं हैं, बल्कि ये सभी पूरी तरह से दोषरहित हैं। इसके अलावा, हम जो भी उलट-पुलट देखते हैं वह भोले-भाले, अज्ञानी, धर्मपरायण लोगों को हैरान कर देता है और दुष्टों की तो बात ही क्या। यह समझना होगा कि परम आत्मा, भगवान हरि का यह मनोरंजन जीवों को उनकी संबंधित मानसिकता के अनुसार फल देने के लिए करना है।
महाभारत (32.33-34) पर एक ही कमेंट्री से कहा गया है: "यद्यपि सर्वोच्च भगवान और सभी जीवों के स्वामी, अच्युत, सच्चिदानंद-विग्रह है, अपने विलोपन मनोरंजनों में अवतारों के जिसमें वह अपने प्रकटन के समय भ्रम या माया नहीं दिखाते हैं, वह एक साधारण जीव की नकल करते हैं, जो राक्षसों को चकमा देने और उन्हें नरक के सबसे अंधेरे क्षेत्रों में भेजने के लिए अपना शरीर छोड़ देता है, जो एक अस्वीकृत शव जैसा दिखता है, और इसे जमीन पर छोड़ने के बाद, वह व्यक्तिगत रूप से वैकुण्ठ जाते हैं।"
युक्ति-मल्लिका के शुद्धि-सौरभ खंड के श्लोक 18-36 का उल्लेख करना चाहिए, जो शेर जैसे तर्कशास्त्री, श्री वादराज स्वामी द्वारा लिखा गया था, जिन्हें श्री माधव-सम्प्रदाय में दूसरे माधवाचार्य के रूप में मनाया जाता है। श्लोक 37-39 में कहा गया है: "यदि कोई अपनी आँखों से चंदन देखता है, तो उस चंदन की सुगंध के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है। इस प्रक्रिया में आँखें नाक की मदद लेती हैं, अन्यथा यदि किसी ने पहले चंदन की सुगंध को नहीं सूँघा होता तो वह इसे देखकर अपनी आँखों से इसकी सुगंध का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता था। इसी तरह, अन्य प्रमाण सुनने से प्राप्त ज्ञान के अर्थ को स्थापित करने के लिए वेदों से सहायता लेते हैं। क्योंकि पारलौकिक विषयों की प्राप्ति में वेदों का प्रमाण प्रमुख है, प्रत्यक्ष (सीधी धारणा) और अनुमान (परिकल्पना) जैसे अन्य प्रमाण, जो वेदों पर निर्भर हैं, अपने विरोधी स्वभाव के कारण पारलौकिक विषयों को समझने के उद्देश्य की पूर्ति करने में असमर्थ हैं। इसलिए परम सत्य पर विचार करने में, अज्ञानी लोगों की दोषपूर्ण दृष्टि को प्रमाण नहीं माना जा सकता है।
इस सब के अलावा, भगवद्-गीता, अध्याय 4, श्लोक 6, 9 और 14, अध्याय 7, श्लोक 6-7 और 24-25, अध्याय 9, श्लोक 8-9 और 11-13, अध्याय 10, श्लोक 3 और 8 और चर्चा करनी चाहिए। अध्याय 16, श्लोक 19 और 20।
अति-अलक्षते शब्द की व्याख्या श्रीमद् भागवतम (11.31.8-9) में की गई है, जिसमें श्री शुकदेव, श्री परीक्षित से इस प्रकार कहते हैं: "ब्रह्मा के नेतृत्व में अधिकांश देवता और अन्य उच्च प्राणी भगवान कृष्ण को अपने निवास में प्रवेश करते हुए नहीं देख पाए, क्योंकि उन्होंने अपनी गतिविधियों का खुलासा नहीं किया था। लेकिन उनमें से कुछ ने उन्हें देखा, और वे अत्यंत आश्चर्यचकित थे। जैसे साधारण लोग किसी बिजली के बोल्ट के पथ का पता नहीं लगा सकते जब वह बादल छोड़ता है, वैसे ही देवता कृष्ण के आंदोलनों का पता नहीं लगा सके क्योंकि वे अपने निवास में लौट आए। [केवल उनके सहयोगी ही उन्हें देख सकते थे।]"
