श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 11: श्री ईश्वर पुरी से मिलन  »  श्लोक 114-119
 
 
श्लोक  1.11.114-119 
এক-দিন প্রভু তা’ন কবিত্ব শুনিযা
হাসি’ দূষিলেন, “ধাতু না লাগে” বলিযা
প্রভু বোলে,—“এ ধাতু ’আত্মনেপদী’ নয”
বলিযা চলিলা প্রভু আপন-আলয
ঈশ্বর-পুরী ও সর্ব-শাস্ত্রেতে পণ্ডিত
বিদ্যা-রস-বিচারে ও বড হরষিত
প্রভু গেলে সেই ’ধাতু’ করেন বিচার
সিদ্ধান্ত করেন তঙ্হি অশেষ-প্রকার
সেই ’ধাতু’ করেন ’আত্মনেপদী’ নাম
আর দিনে প্রভু গেলে, করেন ব্যাখ্যান
“যে ধাতু ’পরস্মৈপদী’ বলি’ গেলা তুমি
তাহা এই সাধিলুঙ্ ’আত্মনেপদী’ আমি”
एक-दिन प्रभु ता’न कवित्व शुनिया
हासि’ दूषिलेन, “धातु ना लागे” बलिया
प्रभु बोले,—“ए धातु ’आत्मनेपदी’ नय”
बलिया चलिला प्रभु आपन-आलय
ईश्वर-पुरी ओ सर्व-शास्त्रेते पण्डित
विद्या-रस-विचारे ओ बड हरषित
प्रभु गेले सेइ ’धातु’ करेन विचार
सिद्धान्त करेन तङ्हि अशेष-प्रकार
सेइ ’धातु’ करेन ’आत्मनेपदी’ नाम
आर दिने प्रभु गेले, करेन व्याख्यान
“ये धातु ’परस्मैपदी’ बलि’ गेला तुमि
ताहा एइ साधिलुङ् ’आत्मनेपदी’ आमि”
 
 
अनुवाद
एक दिन उनकी कविता सुनकर भगवान मुस्कुराए और बोले, "इस वाक्य का क्रियामूल अशुद्ध है। यहाँ आत्मनेपदी रूप का प्रयोग नहीं करना चाहिए।" यह कहकर भगवान घर लौट गए। ईश्वर पुरी शास्त्रों के प्रकांड विद्वान थे और उन्हें शैक्षणिक विषयों का विश्लेषण करने में आनंद आता था। निमाई के जाने के बाद, ईश्वर पुरी ने उनके द्वारा प्रयुक्त क्रियामूल पर विचार किया और विभिन्न कोणों से एक निष्कर्ष पर पहुँचे। उन्होंने क्रियामूल को उसके आत्मनेपदी रूप में ही रहने दिया, और जब अगले दिन निमाई आए, तो उन्होंने समझाया, "मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि आपने कल जिस क्रिया को परस्मैपदी कहा था, वह आत्मनेपदी ही रहेगी।"
 
One day, listening to his poem, the Lord smiled and said, "The verb root of this sentence is incorrect. The Atmanepadi form should not be used here." With this, the Lord returned home. Ishwar Puri was a profound scholar of the scriptures and enjoyed analyzing academic subjects. After Nimai left, Ishwar Puri considered the verb root he had used from various angles and came to a conclusion. He left the verb root in its Atmanepadi form, and when Nimai came the next day, he explained, "I have concluded that the verb you called Parasmaipadi yesterday should remain Atmanepadi."
तात्पर्य
धातु वो क्रियामूल है जो कार्य को दर्शाते हैं। जब लट आदि दश भेदों से मिश्रित होते हैं तब विभिन्न काल और वाच्य बनते हैं। हर क्रिया को तीन पुरुषों और तीन वचनों पर विचार करने से हर काल और वाच्य के नौ रूप बनते हैं। कुछ धातु आत्मनेपदी है और कुछ परस्मैपदी हैं और इन दोनों के अतिरिक्त कुछ उभयपदी धातु भी हैं। परस्‍मैपदी धातु के 90 रूप हैं और आत्मनेपदी रूपों की संख्या भी यही है। इस प्रकार इन दोनों प्रकार के धातुओं के कुल 180 रूप होते हैं। निमाई पंडित के यह कहने पर कि ईश्वर पुरी के उच्चारित श्लोक के धातु रूप आत्मनेपदी नहीं है, ईश्वर पुरीपाद ने निष्कर्ष निकाला कि व्याकरण के अनुसार धातु का रूप उभयपदी है। इसलिए धातु के आत्मपदी रूप का उपयोग करने में कोई त्रुटि नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)