श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 10: श्री लक्ष्मीप्रिया के साथ विवाह  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.10.7 
ঊষঃ-কালে সন্ধ্যা করি’ ত্রিদশের-নাথ
পডিতে চলেন সর্ব-শিষ্য-গণ-সাথ
ऊषः-काले सन्ध्या करि’ त्रिदशेर-नाथ
पडिते चलेन सर्व-शिष्य-गण-साथ
 
 
अनुवाद
प्रातःकालीन अनुष्ठान करने के बाद त्रिदशा के स्वामी अपने सहपाठियों के साथ विद्यालय चले गए।
 
After performing the morning rituals, the Lord of Tridasha went to school with his classmates.
तात्पर्य
शब्द त्रि यानी ‘तीन’, शब्द त्रिदशेर-नाथ में, स्थानों के विचार से, भूः, भुवः और स्वः लोकतंत्रों का संदर्भ देता है; समय के विचार से, अतीत, वर्तमान और भविष्य का संदर्भ देता है; व्यक्तियों के विचार से, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का संदर्भ देता है; और शब्द दश, दिशाओं के विचार से, पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, पूर्वोत्तर, दक्षिणपूर्व, उत्तरपश्चिम, दक्षिणपश्चिम, ऊपर और नीचे का संदर्भ देता है। शब्द त्रिदश प्रत्येक दिशा को संदर्भित करता है—ऊपर, केंद्र और नीचे। अन्यथा शब्द त्रिदश, व्यक्तियों के विचार से, तैंतीस देवताओं को संदर्भित करता है। कम बुद्धिमान दृष्टिकोण से शब्द त्रिदश-पुरी स्वर्गीय राज्य का संदर्भ देता है, और शब्द त्रिदश-नाथ इंद्र का संदर्भ देता है, शची का पति। और बौद्धिक दृष्टिकोण से यह भगवान उपेंद्र का संदर्भ देता है। कुछ लोग कहते हैं कि त्रिदश बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु और दो अश्विनी-कुमारों का संदर्भ देता है। फिर भी अन्य लोग कहते हैं कि इन तैंतीस देवताओं में से प्रत्येक दस मिलियन अन्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। विद्वान दृष्टिकोण के अनुसार, इन सभी शब्द अर्थों को विष्णु में शामिल किया गया है।

वाक्यांश शिष्य-गण-साथ इंगित करता है कि चूंकि गुरू गंगादास पंडित के शिष्य कमोबेश निमाई के अधीनस्त थे, वे उन्हे सिद्धांत शिष्य के रूप में और जितना उनके गुरू के रूप में सम्मान करते थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)