श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 10: श्री लक्ष्मीप्रिया के साथ विवाह  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  1.10.58 
আইর কথায বিপ্র ’রস’ না পাইযা
চলিলেন বিপ্র কিছু দুঃখিত হৈযা
आइर कथाय विप्र ’रस’ ना पाइया
चलिलेन विप्र किछु दुःखित हैया
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण शची के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ और इसलिए निराश होकर चला गया।
 
The Brahmin was not satisfied with Sachi's answer and hence went away disappointed.
तात्पर्य
हेमचन्द्र ने कहा है कि-: "रस शब्द से जल, वीर्य, श्रृंगार आदि पाँच श्रेष्ठ रस, वीर आदि सात हीन रस, सर्प आदि प्राणियों के विष, जिससे हृदय पिघल जाए ऐसे भाव, राग, चित्रकला, शरीर के अंग, कड़वा आदि छ: रस और पारद भी अभिप्रेत है।" लौकिक अलंकार-शास्त्र के अनुसार-: मन की प्रसन्नता अथवा स्थायी-भाव या स्थायी आनंद (अथवा रति) को जब विभाव आदि अंगों से संवर्द्धित किया जाता है तो उससे एक अद्भुत आनंदमय परिणाम उत्पन्न होते हैं, जिसे रस कहा जाता है। रस नौ प्रकार के होते हैं-शृंगार या आदि (संभोग), वीर (पराक्रम), करुण (करुणा), अद्भुत (आश्चर्य), हास्य, भयानक, बीभत्स, रौद्र (क्रोध) और शांत। एक और मत के अनुसार दस प्रकार होते हैं-उपर्युक्त के साथ वात्सल्य या पालन भी। हृदय की अभिलाषा, समास-अर्थ-प्रधानता, सुख, आनंद या प्रेम-भावना और स्वरस या स्वारस्य शब्दों में रस शब्द का अर्थ भी विचार करना चाहिए, जो अभिप्राय या इच्छा का बोध कराता है। आलंकारिक शास्त्र के अनुसार, भक्ति-रसामृत-सिंधु में-:

व्यतीत्य भावाना-वर्त्म यश्चमत्कार-भार-भूः

हृदि सत्त्वोज्ज्वले बाढं स्वादते स रसो मतः

"जो कल्पना से परे है, विस्मय के बोझ से भरा हुआ है और सत्त्व से आलोकित हृदय में भली-भाँति से आस्वादन किया जाता है-वह रस कहलाता है।"

स्थायी भावोऽत्र स प्रोक्तः श्री-कृष्ण-विषया रतिः

"कृष्ण के प्रति निरंतर आनंदमय प्रेम को स्थायी आनंद कहा जाता है।" माँ शची ने वनमाली आचार्य, जो श्रेष्ठ से श्रेष्ठ घटाक थे, द्वारा निमाई के विवाह के प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दिया और बातचीत का विषय बदल दिया। अतः वनमाली को शची के कथनों से रस की प्राप्ति नहीं हुई, बल्कि उसमें रस की अनुपस्थिति या शुष्क शांत-रस की प्राप्ति हुई, अर्थात् उसने एक उदासीन अचंचल भाव को ग्रहण किया। यही कारण है कि साधारण अलंकार साहित्य में शुष्क शांत-रस को वास्तव में रस के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है, क्योंकि यह भावों की पारस्परिकता से रहित होता है, जैसा कि कहा गया है: शमस्य निर्विकारत्वान् नाट्य-ज्ञैर्नैष मन्यते-"शम-भाव (शांत-रस) की अचल प्रकृति के कारण, विद्वान व्यक्ति इसे रस के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)