व्यतीत्य भावाना-वर्त्म यश्चमत्कार-भार-भूः
हृदि सत्त्वोज्ज्वले बाढं स्वादते स रसो मतः
"जो कल्पना से परे है, विस्मय के बोझ से भरा हुआ है और सत्त्व से आलोकित हृदय में भली-भाँति से आस्वादन किया जाता है-वह रस कहलाता है।"
स्थायी भावोऽत्र स प्रोक्तः श्री-कृष्ण-विषया रतिः
"कृष्ण के प्रति निरंतर आनंदमय प्रेम को स्थायी आनंद कहा जाता है।" माँ शची ने वनमाली आचार्य, जो श्रेष्ठ से श्रेष्ठ घटाक थे, द्वारा निमाई के विवाह के प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दिया और बातचीत का विषय बदल दिया। अतः वनमाली को शची के कथनों से रस की प्राप्ति नहीं हुई, बल्कि उसमें रस की अनुपस्थिति या शुष्क शांत-रस की प्राप्ति हुई, अर्थात् उसने एक उदासीन अचंचल भाव को ग्रहण किया। यही कारण है कि साधारण अलंकार साहित्य में शुष्क शांत-रस को वास्तव में रस के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है, क्योंकि यह भावों की पारस्परिकता से रहित होता है, जैसा कि कहा गया है: शमस्य निर्विकारत्वान् नाट्य-ज्ञैर्नैष मन्यते-"शम-भाव (शांत-रस) की अचल प्रकृति के कारण, विद्वान व्यक्ति इसे रस के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं।"
