श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 10: श्री लक्ष्मीप्रिया के साथ विवाह  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.10.45 
এই-মত বৈকুণ্ঠ নাযক বিদ্যা-রসে
ক্রীডা করে, চিনিতে না পারে কোন দাসে
एइ-मत वैकुण्ठ नायक विद्या-रसे
क्रीडा करे, चिनिते ना पारे कोन दासे
 
 
अनुवाद
इस प्रकार वैकुण्ठ के स्वामी ने विद्वान के रूप में आनन्दपूर्वक अपना जीवन बिताया, फिर भी उनका कोई भी सेवक उन्हें पहचान नहीं सका।
 
Thus the Lord of Vaikuntha lived his life happily as a scholar, yet none of his servants could recognize him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)