प्रभु कहे,—“सन्धि-कार्य-ज्ञान नाहि या’र
कलि-युगे ’भट्टाचार्य’ पदवी ताहार
अनुवाद
भगवान ने कहा, “कलियुग में, जो व्यक्ति संयोग के नियमों को भी नहीं जानता, उसे भी भट्टाचार्य की उपाधि दी जाती है।
The Lord said, “In Kaliyuga, a person who does not even know the laws of coincidence is given the title of Bhattacharya.
तात्पर्य
“भट्टाचार्य” (श्रुतियों, न्याय या मीमांसा के विद्वत विद्वान) की उपाधि को स्वीकार करना, बच्चों के व्याकरण में पाए जाने वाले संधि या शब्दों को मिलाने के प्राथमिक पाठों से गुज़रे बिना, तर्कहीन है, अधार्मिकता का आधार है, और केवल कलियुग में संभव है। इस बात की पुष्टि श्रीमद् भागवतम् (12.3.38) में इस प्रकार है: धर्मं वक्ष्यन्त्य अधर्म-ज्ञा अधिरुह्य उत्तमासनम् - "जो लोग धर्म के बारे में कुछ नहीं जानते, वे एक उच्च आसन पर बैठेंगे और धार्मिक सिद्धांतों पर बोलने का अनुमान लगाएंगे।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥