श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 10: श्री लक्ष्मीप्रिया के साथ विवाह  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.10.33 
এমন পাণ্ডিত্য কিবা মনুষ্যের হয?
হস্ত-স্পর্শে দেহ হৈল পরানন্দ-ময
एमन पाण्डित्य किबा मनुष्येर हय?
हस्त-स्पर्शे देह हैल परानन्द-मय
 
 
अनुवाद
"क्या किसी साधारण मनुष्य में ऐसा ज्ञान हो सकता है? उनके स्पर्श मात्र से ही मेरा शरीर आनंद से भर गया।"
 
"Can any ordinary human being have such knowledge? Just his touch filled my body with joy."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)