शब्द वीरासन बैठने (वीर की तरह) के तरीके को संदर्भित करता है जिसमें बायां पैर दाएं जांघ पर और दायां पैर बाएं जांघ पर होता है। इसका उल्लेख श्रीधर स्वामी ने श्रीमद भागवतम पर अपनी टिप्पणी (4.6.38) में किया है जिसमें वे योग-शास्त्रों से उद्धृत करते हुए कहते हैं: "दाएं पैर को बाएं जांघ पर और बाएं पैर को दाएं पैर पर रखना जबकि बाएं हाथ को बाएं जांघ पर रखना और दाएं हाथ को तर्क-वितर्क करने वाले तरीके से उठाना वीरासन कहलाता है।"
