श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 10: श्री लक्ष्मीप्रिया के साथ विवाह  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.10.12 
যোগ-পট্ট-ছান্দে বস্ত্র করিযা বন্ধন
বৈসেন সভার মধ্যে করি’ বীরাসন
योग-पट्ट-छान्दे वस्त्र करिया बन्धन
वैसेन सभार मध्ये करि’ वीरासन
 
 
अनुवाद
निमाई ने संन्यासी की तरह वस्त्र धारण किया और वे वीरासना मुद्रा में बैठे।
 
Nimai dressed like a monk and sat in the Virasana posture.
तात्पर्य
इस श्लोक में शब्द योग-पट्ट वस्त्र पहनने के वैदिक संन्यासी के तरीके को संदर्भित करता है। शब्द योग-कक्षा श्रीधर स्वामी की श्रीमद भागवतम पर टिप्पणी (4.6.39) में पाया जाता है। किसी संन्यासी के द्वारा एक बेल्ट की तरह कमर और जांघ के इर्दगिर्द कस कर बांधा जाने वाला कपड़ा योग-पट्ट कहा जाता है। पद्म पुराण के कार्त्तिक-माहात्म्य के 2 अध्याय में कहा गया है: "जिस वस्त्र को एक संन्यासी अपने एक ओर कंगन की तरह लपेटकर बांधता है और जिसकी पीठ पीछे तक ढकती है और घुटनों तक लटकी रहती है उसे योग-पट्ट कहा जाता है।"

शब्द वीरासन बैठने (वीर की तरह) के तरीके को संदर्भित करता है जिसमें बायां पैर दाएं जांघ पर और दायां पैर बाएं जांघ पर होता है। इसका उल्लेख श्रीधर स्वामी ने श्रीमद भागवतम पर अपनी टिप्पणी (4.6.38) में किया है जिसमें वे योग-शास्त्रों से उद्धृत करते हुए कहते हैं: "दाएं पैर को बाएं जांघ पर और बाएं पैर को दाएं पैर पर रखना जबकि बाएं हाथ को बाएं जांघ पर रखना और दाएं हाथ को तर्क-वितर्क करने वाले तरीके से उठाना वीरासन कहलाता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)