श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 10: श्री लक्ष्मीप्रिया के साथ विवाह  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  1.10.119 
যে শুনযে প্রভুর বিবাহ-পুণ্য-কথা
তাহার সṁসার-বন্ধ না হয সর্বথা
ये शुनये प्रभुर विवाह-पुण्य-कथा
ताहार सꣳसार-बन्ध ना हय सर्वथा
 
 
अनुवाद
जो कोई भगवान के विवाह के इन शुभ प्रसंगों को सुनता है, वह कभी भी सांसारिक जीवन में नहीं उलझता।
 
Whoever listens to these auspicious episodes of the Lord's marriage never gets entangled in worldly life.
तात्पर्य
इस भौतिक जगत् में लोग एक लड़के और लड़की के विवाह के बारे में सुनकर हर्षित होते हैं। ऐसे विषयों से प्रोत्साहित होकर संसार बंधे जीव भौतिक बंधनों के दुःखों का सामना करने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। पर माया के नियंत्रक श्रीमन् महाप्रभु के विवाह से सम्बंधित विषय ऐसे नहीं हैं। भगवान का यह समय-व्यापार भौतिक अस्तित्व की निरर्थकता को प्रदर्शित करने के लिए अभिप्रेत है। एक जितनी भौतिक सुखों से आसक्त होता है, वह सांसारिक लड़के और लड़की के विवाह को इंद्रिय तृप्ति का आदर्श उदाहरण मानता है, और यदि वह सर्वोच्च भगवान के विवाह के आध्यात्मिक समय-व्यापार को उस बंधी हुई आत्मा के इंद्रिय-सुख की गतिविधियों के समान मानता है, जो कि स्पष्ट रूप से मीठा हैं पर अंत में विष हैं, तो वह निश्चित रूप से भौतिक अस्तित्व के बंधन में उलझ जाएगा। पर सर्वोच्च भगवान ही समस्त आनंद के एकमात्र पात्र हैं, और सेवक, दासी, और सेवा की अद्भूत सामग्री, जो सभी उसके नियंत्रण में हैं, ऐसी अशुभता उत्पन्न नहीं कर सकते। जहाँ भगवान की प्रसन्नता विद्यमान है, जितों की इंद्रिय-सुख वहाँ रह ही नहीं सकते। इस संबंध में श्रीमद्भगवतम (11.2.42) के निम्न श्लोकों जैसे मंगलकारी अमृतवाणी कथनों पर विचार-विमर्श करना चाहिए: भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिर् अन्यत्र चैष त्रिक एक-कालः- "भक्ति, सर्वोच्च भगवान का प्रत्यक्ष अनुभव, और अन्य पदार्थों से विरक्ति- ये तीनों एक साथ होते हैं," और भक्ति-रसामृत-सिन्धु (1.2.187) से: ईहा यस्य हरर् दासे कर्मणा मनसा गिरा

निखिलास्व अपि अवस्थासु जीवन्-मुक्तः स उच्यते

" जो व्यक्ति अपने शरीर, मन, बुद्धि और वाणी से कृष्ण की सेवा में कार्य करता है वह भौतिक जगत् में रहकर भी मुक्त व्यक्ति है, भले ही वह अनेक स्पष्ट रूप से भौतिक गतिविधियों में व्यस्त रहे।" सर्वोच्च भगवान विष्णु माया के परात्पर नियंत्रक हैं, इसलिए उन्हें भौतिक या किसी साधारण जीव की तरह मानना महा अपराध है। जब सर्वोच्च भगवान विष्णु के प्रति एक परात्पर सेवा का भाव जागृत होता है, तब भगवान की सेवा करने के लिए प्रवृत्त हुए मुक्त भक्त अब भौतिक बंधन में उलझे नहीं रहते। दूसरे शब्दों में, यदि एक जीव अपने को सर्वोच्च भगवान को प्रसन्न करने के लिए उत्सुक करता है, तो वह भौतिक अस्तित्व के बंधन से मुक्त हो जाता है, जो भगवान से अलग है और कभी भी व्यक्तिगत रूप से इंद्रिय सुख या भौतिक आनंद का प्रयास नहीं करता।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)